'मायाजाल' में फंसा उत्तर प्रदेश का मीडिया
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं। हर बार की तरह उसी पार्टी की जीत होगी, जिसके बारे में पब्लिक के बीच अच्छा फीडबैक होगा। इस हिसाब से देखा जाये तो सत्तारूढ़ दल बहुजन समाज पार्टी की जीत अभी से सुनिश्चित हो गई है। आप सोच रहे होंगे कि मायावती ने आखिर ऐसा क्या काम कर दिया जो अभी से उनकी जीत के शंख बजने लगे? असल में यह सब होगा 'मायाजाल' की वजह से, जिसमें लखनऊ समेत पूरे यूपी का मीडिया फंस गया है।
यहां पर 'मायाजाल' के दो मतलब हैं। पहला माया यानी पैसा और दूसरी माया यानी मायावती। इन दोनों जालों की डोर मुख्यमंत्री के हाथ में है। चलिये हम साफ शब्दों में आपको बता ही देते हैं कि उत्तर प्रदेश का मीडिया मायातवी के आगे नतमस्तक हो गया है। नंबर एक से लेकर नंबर दस, ग्यारह, बारह... सभी अखबार मायावती के टेरर में जी रहे हैं। मायावती कितना ही भ्रष्टाचार, अत्याचार क्यों ना करें, कोई अखबार उनके खिलाफ लिखने के लिए खड़ा नहीं होता। चाहे वो अंग्रेजी अखबार हो या हिन्दी और या फिर उर्दू। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी या अन्य कोई भी मायावती के खिलाफ सौ सबूत भी लाकर रख दें, तब भी मीडिया आंख मूंद कर खाड़ा रहेगा।
यह सब सिर्फ इसलिए क्योंकि मायावती के खिलाफ एक खबर, सरकारी विज्ञापन रुकवा देती है। एक विज्ञापन रुकने का मतलब एक से दस लाख रुपए तक का नुकसान। चलिये हम आपको कुछ उदाहरण भी दे देते हैं। मात्र तीन दिन पहले भाजपा ने मायावती के 5000 करोड़ रुपए के घोटाले (मायावती ने नोएडा में किया 5000 करोड़ का घोटाला) के सबूत जनता के सामने प्रस्तुत किये और सरकार से जांच की मांग की। एक बड़े होटल में यह प्रेसवार्ता बुलाई गई, सभी अखबार के प्रत्रकार पहुंचे। लेकिन दूसरे दिन एक भी अखबार में खबर नहीं दिखी।
यही नहीं इससे पहले भी जब भाजपा ने मायावती के 100 घोटालों की प्रदर्शनी (खबर के लिए क्लिक करें) लगायी तो उत्तर प्रदेश के एक भी अखबार में खबर नहीं छपी। और तो और कुछ महीने पहले समाजवादी पार्टी से जुड़े एक अखबार ने माया के खिलाफ लिखा तो अखबार प्रबंध निदेशक का राजभवन कालोनी में स्थित घर खाली करवा लिया गया। घर का सामान पुलिस ने खुद निकाल बाहर फेंक दिया।
यही नहीं मात्र चार दिन पहले नंबर वन अंग्रेजी अखबार ने मायवती के खिलाफ खबर प्रकाशित की तो 3 लाख रुपए का विज्ञापन छीन लिया गया। ऐसे में हिन्दी के अखबारों की तो बात ही क्या करें।
2008 में जब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मायावती के पोस्टरों पर कालिक पोती। तो हिन्दी के एक प्रतिष्ठित टैबलॉयड के फोटोग्राफर ने पूरी रात जाग कर उन पोस्टरों के फोटो खींचे। उस रात डीएम, एसएसपी से लेकर कई आईएएस अधिकारियों ने रातों रात बहन जी के पोस्टर साफ कर डाले। रातों रात वो तस्वीरें पूरे मीडिया में बंट गईं, लेकिन दूसरे दिन उस टैबलॉयड में तो दूर की बात अन्य किसी भी अखबार में खबर या फोटो प्रकाशित नहीं हुई।
इन उदाहरणों के बाद आपको अंदाजा हो गया होगा कि यूपी का मीडिया किस खौफ में जी रहा है। आपको यह भी अंदाजा हो गया होगा कि भाजपा, सपा और कांग्रेस को यूपी में वापसी करने के लिए कितनी मेहतन करनी पड़ेगी, क्योंकि पब्लिक के बीच भरोसा कायम करने के लिए मीडिया उनका साथ नहीं देने वाला।












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