'मंहगाई और काले धन पर बजट में कुछ नहीं'

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डॉक्टर आलोक पुराणिक, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ

बजट में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अनेक घोषणाएँ की हैं. इच्छाओं के डाक्यूमेंट के तौर पर यह बजट बहुत घोषणाएं करता है. जैसे दो हज़ार से ज़्यादा की जनसंख्या वाले हर एक गांव में एक बैंक होगा. अल्पसंख्यकों को दिए जाने वाले क़र्ज़ में बढ़ोत्तरी होगी. विदेशों में जो रक़म भारत से गई है, उसे वापस लाने की कोशिश की जाएगी.

क़र्ज़ चुकाने वाले किसानों को तीन प्रतिशत की छूट दी जाएगी. सारी पंचायतें ब्रॉडबैंड इंटरनेट से जुड़ जाएंगीं. सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों को क़रीब 20 हज़ार करोड़ रुपए की पूंजी दी जाएगी. अक्तूबर, 2010 से दस लाख यूनिक आइडेंटिटी कार्ड दिए जाएंगे. ब्रांडेड कपड़े 10 प्रतिशत तक महंगे होंगे. विदेशी निवेशक भी भारतीय म्युचुअल फ़ंड में निवेश कर सकेंगे. हवाई जहाज़ की घरेलू यात्रा और महंगी होगी.

मेडिकल टेस्ट सेवाओं पर अब सेवाकर लगेगा लेकिन सेवाकर में बढ़ोत्तरी नहीं की गई है. यह 10 प्रतिशत पर ही रखा गया है. नए बैंक बनाने के लिए बिल जल्द आएगा. नई कंपनी बिल भी जल्द आएगा. कोल्ड स्टोरेज उद्योग को राहत दी गई है. कंपनियों पर लगने वाला सरचार्ज 7.5 प्रतिशत से कम कर पांच प्रतिशत कर दिया गया है पर कंपनियों पर लगने वाला न्यूनतम वैकल्पिक कर 18 प्रतिशत से बढ़ाकर 18.50 प्रतिशत बढ़ाकर कर लिया जाएगा.

2011-12 में सार्वजनिक इकाइयों के शेयरों से विनिवेश का लक्ष्य 40 हज़ार करोड़ रखा गया है. 2012 तक तमाम सब्सिडी को सीधे ज़रुरतमंदों को नग़द दिया जा सकेगा. करमुक्त आय एक लाख 60 हज़ार रुपए से बढ़कर एक लाख 80 हज़ार रुपए कर दी गई है, यानी क़रीब दो हजार रुपए का फ़ायदा होने के आसार है. महंगाई की गति बहुत तेज़ी से बढ़ रही है, पर महंगाई से निपटने के लिए दो हज़ार की रक़म कम है.

आम आदमी के इस्तेमाल के लिए प्रयोग होने वाली चीजों, रोटी, कपड़ा और मोबाइल की बात करें तो रोटी सस्ती नहीं हुई है, कपड़ा महंगा हुआ है और मोबाइल के प्रयोग में कोई राहत नहीं मिली है. यानी अगर दो महत्वपूर्ण चुनौतियों के संदर्भ में देखें, तो साफ़ होता है कि महंगाई और काले धन के मामले में सिर्फ बातों के अलावा बजट ने कुछ नहीं किया है.

महंगाई कहीं भी, किसी स्तर पर बजट के बाद कम होती नहीं दिख रही है, बल्कि कपड़े महंगे हुए हैं. काले धन को देखें, तो सिर्फ हवाई घोषणाएं हैं. काले धन पर अध्ययन किया जाएगा, फिर क़दम उठाये जाएंगे. यानी काले धन पर बजट ने कछ ख़ास नहीं किया है. एक बात जो समझ में नहीं आ रही है वो ये कि जिन उद्योगों से ज़्यादा वसूली की जा सकती थी, उनसे अधिक वसूली नहीं की गई. उदाहरण के लिए ऑटो क्षेत्र में ज़बरदस्त तेज़ी देखी जा रही है. कई कारों और बाइकों को हासिल करने के लिए लगने वाली प्रतीक्षा सूची लगातार लंबी होती जा रही है.

क़रीब 30 प्रतिशत सालाना के हिसाब से ऑटो क्षेत्र में तेज़ी दर्ज की गई है. इस उद्योग पर अगर थोड़ा सा कर ज़्यादा लग जाता, तो कुछ ख़ास फ़र्क़ देने वालों की जेब पर नहीं पड़ता. पर इस क्षेत्र से कर की वसूली को जस का तस रखा गया है. काले धन को बाहर लाने के लिए कुछ ठोस सुझाव इस बजट में आएंगे, ऐसी उम्मीद की जा रही थी. पर काले धन को बाहर निकालने की कोई इच्छा या शक्ति सरकार में दिखाई नहीं देती.

काले धन का अगर एक हिस्सा भी बाहर आ पाए, तो सरकार को बहुत फ़ायदा हो सकता है. पर काले धन को लेकर सरकार और बजट में कोई चिंता नहीं दिखाई देती है. सवाल है कि इस बजट से फिर किसे क्या मिला है? इस बजट से शेयर बाज़ार उत्साहित है, बजट के फ़ौरन बाद 400 बिंदुओं से ऊपर चला गया. बाज़ार इसलिए उत्साहित है कि बजट ने कॉरपोरेट सेक्टर के लिए, कॉरपोरेट सेक्टर के मुनाफ़ो के लिए कोई नकारात्मक घोषणा नहीं की. करों में बढ़ोत्तरी नहीं हुई.

ऑटो सेक्टर के शेयर बहुत उछले. पहले आशंका थी कि ऑटो क्षेत्र की तेज़ी के बाद इस क्षेत्र पर लगने वाले करों में बढ़ोत्तरी हो सकती है. लेकिन ऐसा नही हुआ. बजट के ठीक पहले एक अध्ययन में यह साबित हुआ था कि सार्वजनिक वितरण व्यवस्था यानी राशन व्यवस्था का क़रीब 55 प्रतिशत सामान काले बाज़ार में बिकने के लिए जाता है.

राशन की व्यवस्था में सुधार हो सके, तो महंगाई को झेलने के लिए कुछ ठोस तैयारी संभव है. पर बजट ने राशन व्यवस्था के बारे में कुछ नहीं कहा. यानी कुल मिलाकर यह साफ़ हुआ है कि आम आदमी के लिए रोटी, कपड़ा और मोबाइल सस्ता नहीं हुआ है. राशन पर कुछ नहीं हुआ है. काले धन पर कुछ नहीं हुआ है. शेयर बाजार ज़रुर खुश है, पर शेयर बाजार का ताल्लुक़ पूरी अर्थव्यवस्था से नहीं, कुछ संपन्न निवेशकों और कॉरपोरेट सेक्टर से है.

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