सभ्यों के बीच 'असभ्य'

सभ्यों के बीच 'असभ्य'

सुशील झा

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

बंगाल और उड़ीसा के बीच में अमीबा की तरह निकलता बैठता, लेटता सा है झारखंड. इस दस साल के सूबे के पूर्वी छोर पर बसा है मेरा घर.....नहीं...मेरी छोटी सी कॉलोनी...

तीन तरफ पहाड़ और बाकी नदी.घर से निकलो तो पहाड़ मुंह पर थपकियां सा देता लगता है. टहल कर दूसरे छोर पर नदी बहती है.कभी सूखी, कभी मटमैली नीली तो कभी बिल्कुल चमकदार. पानी से अधिक रेत...

दस बारह साल में बहुत कुछ बदल गया है. मुहावरे की शक्ल में कहूं तो सुवर्ण रेखा में दस साल में बहुत पानी बह गया है. कॉलोनी में भी और झारखंड में भी.

पहले कॉलोनी से मांगी हुई मोटरसाइकिल पर टाटा आते थे बिना हेलमेट के, लाठी वाली पुलिस पकड़ती थी तो कान पकड़ के उठक बैठक करवाती थी और डांटती थी.

अब पुलिस नहीं सेना की वर्दी वाली सीआरपीएफ़ रास्ता रोकती है. हेलमेट नहीं देखती कागज़ पत्तर मांगती है गाड़ी के. न हो तो हिरासत में भी जाने का मौका मिलेगा.

ऑटोमोबाइल, स्टील, कॉपर, यूरेनियम वाले इलाक़े में छोटी छोटी कॉलोनियों से निकलते ही जीवन अबूझ पहेली जैसा लग सकता है. ये कॉलोनियां नखलिस्तान हैं झारखंड नामक रेगिस्तान में.

इन नखलिस्तानों में सबकुछ है. सुरक्षा, नौकरी, क्लब, टीवी, भविष्य.बाहर मिलते हैं काले कलूटे अधनंगे तथाकथित असभ्य आदिवासी जिन्हें कॉलोनीवाले अक्सर घिन से देखते हैं.

अलग दुनिया

यदा कदा कोई असभ्य कॉलोनी में रहता है अपनी अलग दुनिया बनाकर. काली देह पर सरसों का तेल चुपड़े, चार खानों वाला गमछा कमर में लपेटे जब वो बंशी की तान सुनाता है तो सारे सभ्यों के बच्चे उसके गोल-गोल घूमते हैं.

ये असभ्य कभी गालियां नहीं देता, अपने काम से मतलब रखता है. जल्दी दोस्ती नहीं करता. दोस्ती कर ले तो जान देने को तैयार रहता है. बेहतरीन फुटबॉल खेलता है. उसे सभ्यों के खेल क्रिकेट से अधिक मतलब नहीं. वो मिट्टी की हंडिया में खाना पकाता है. वो अपनी भाषा बोलता है.. शायद इसीलिए असभ्य है.

वो पत्थरों को मानता है. पेड़ों को पूजता है. प्रकृति से प्यार करता है. वो कॉलोनी वालों की तरह मूर्ति नहीं पूजता. हर तीसरे दिन नए कपडे नहीं पहनता औऱ न ही उनकी औरतें टीवी देखकर फैशन करती हैं. शायद इसलिए वो असभ्य हैं.

उनका बच्चे पांच साल की उम्र में तैरना जानता है. मछलियां पकड़ता है. पेड़ पर चढ़ सकता है और न जाने कितनी जड़ी बूटियां और फल-फूल पहचानता है. कॉलोनी का बच्चा तब तक मां की गोद में एबीसीडी सीखता है. और यहां भी एबीसीडी बोलने वाला ही सभ्य कहलाता है.

उनकी औरतें साड़ियां पहनना कम पसंद करती हैं क्योंकि उनकी ज़िंदगी खेतों में और पहाड़ों में गुज़रती थीं. अब सड़कें बनाने और सभ्य लोगों के कारखाने बनाने में गुज़रती हैं.

जीत किसकी?

मेहनत के तप से ये तांबई दिखती हैं. पहले इन्हें छोकरी कहा जाता था...अब ये रेजा* और कुली बुलाई जाती हैं और सभ्य ठेकेदार अपनी सुंदर गोरी फैशनेबल बीवियों को छोड़कर इन रेजा़ कुलियों की आगोश में रात बिताना पसंद करते हैं.

झारखंड में एक पौधा होता है, पौधा भी नहीं. पेड़ और पौधे के बीच का कुछ. लंबी डंडियां और फिर एक फूल जामुनी रंग का.. इसे अमोरी बुलाते हैं मतलब जो न मरे..किसी भी गंदे नाले कीचड़ और निर्जन जगह पर उग आते हैं.

सभ्य कहते हैं कि इसका कोई उपयोग नहीं. हम इसकी डंडियों से कुछ कुछ असभ्य खेल खेला करते थे.

ये आदिवासी इन अमोरियों की तरह ही हैं. उन स्थानों पर उगते हैं जहां सभ्य जाने से डरते हैं. उग आते हैं और फलते फूलते हैं तब तक जब तक कोई सभ्य आकर उन्हें सभ्यता का पाठ न पढ़ाए. उनके फूलों को तोड़कर इस्तेमाल करे अपने जूड़े में लगाने के लिए और फिर कहे कि इसका कोई ऊपयोग नहीं. उनकी डंडियों को इस्तेमाल करे अपने युद्ध में.

अमोरी ...ओह माफ़ करना आदिवासी उफ़ नहीं करते. सभ्यता और असभ्यता की इस होड़ में जीत सभ्यों की ही होगी और हम तथाकथित सभ्य कागज़ काले कर कर के हमेशा उन सभ्यों का साथ देंगे तो जो इन असभ्यों के नाम पर अपनी संस्थाएं चलाते हैं....

*रेजा—झारखंड में महिला मज़दूर को रेजा कहते हैं.

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