घर तोड़ो, अर्थव्यवस्था का सत्यानाश करो!
एस. गुरुमूर्ति
नई दिल्ली, 13 फरवरी (आईएएनएस)। 'महिलाओं द्वारा पतियों का उत्पीड़न' शीर्षक से हाल ही में खोली गई वेबसाइट के समाचार-पत्र के एक खंड में एक समाचार-विश्लेषण का शीर्षक इस प्रकार था- "महिलाएं दहेज उत्पीड़न से निपटने के हथियार को अब मनमानी का साधन बना रही हैं।"
इस विश्लेषण से एक चौंकाने वाला तथ्य प्रकाश में आया, सन् 2005 में, चेन्नई में सिटी पुलिस के दहेज-विरोधी सेल में दर्ज की गई 260 शिकायतों में से 200, लगभग 77 प्रतिशत शिकायतें झूठी पाई गईं। सन् 2006 में फर्जी शिकायतों की संख्या में भी कोई कमी होती नहीं दिखी, बल्कि उनमें और वृद्धि हो गई तथा अक्टूबर में 285 शिकायतों में से 220 यानी 77 प्रतिशत से अधिक शिकायतों को झूठा पाया गया। हर 60 में से केवल पांच शिकायतें ही वास्तविक थीं।
इन शिकायतों का उद्देश्य स्पष्ट था- पति के माता-पिता को घर से खदेड़ना। विश्लेषण में कहा गया कि अनेक मामलों मे पति-पत्नी को समझा-बुझाकर साथ रहने को राजी करने में पुलिस सफल रही। रिपोर्ट के अनुसार पति उत्पीड़न के शिकार हैं। यह एक पक्ष है।
उसी दिन (14 नवंबर, 2006) इस समाचार-पत्र के महिला खंड में 'उत्पीड़नों के लिए कार्यवाही का समय' शीर्षक के अंतर्गत यह विश्लेषण प्रकाशत हुआ- 'स्त्री का जीवन, विषय का दूसरा पक्ष-पतियों द्वारा अमानवीय ढंग से प्रताड़ित महिलाओं की दिल दहलाने वाली कहानियां'। यहां उत्पीड़न की शिकार पत्नियां थीं।
इस विश्लेषण में आगे बताया गया कि नया कानून, 'महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम', किस तरह उत्पीड़ितों, दुर्व्यवहार की शिकार पत्नियों को राहत प्रदान कर सकता है, लेकिन उस लेख में यह चेतावनी भी थी- बशर्ते कि वह कार्रवाई करें। लेख में यह प्रश्न उठाया गया- "क्या वे अपने खोल से बाहर आएंगी और कार्रवाई करेंगी, कानून का इस्तेमाल करेंगी? यदि वे ऐसा नहीं करती हैं तो कानून कागज तक ही सीमित रहेगा।"
दोनों विश्लेषण संयोगवश महिलाओं द्वारा ही लिखे गए हैं, पर एक-दूसरे के विपरीत हैं। मैंने दोनों एक साथ पढ़े, दोनों विश्लेषण वर्तमान और उभरते तथ्यों को सामने सखते हैं। अर्थात् रुढ़िवादी पुरुष महिलाओं का उत्पीड़न करते हैं, लेकिन आधुनिक महिलाएं भी पुरुषों को उतना ही उत्पीड़ित करती हैं। अधिकतर आधुनिक महिलाओं ने अपने अंदर झांकने की उस परंपरा को पीछे छोड़ दिया है, जो उन्हें कमजोर बनाती है। फिर भी सार्वजनिक भाषणों में यही कहा जाता है कि सभी महिलाएं अभी भी परंपरावादी हैं, विनम्र हैं और पुरुष ही स्त्रियों को सताते हैं।
इस भाषणबाजी का नेतृत्व आधुनिक महिलाओं द्वारा किया जाता है। इनमें से अधिकतर उन परंपराओं का दायित्व नहीं उठाती जो स्त्रियों के मार्ग में बाधा समझी जाती हैं। झूठी शिकायतों से पता चलता है कि नए कानूनों से शक्ति प्राप्त आधुनिक महिलाओं द्वारा पतियों को इसलिए उत्पीड़ित किया जाता है, कि उन्हे पति के माता पिता को साथ रखना होगा। अत: ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक परिवारों मे जिस बात को लेकर कलह विवाद होता है, उसका कारण एकल बड़ा परिवार है। सवाल यहां मर्द औरत का नहीं, बल्कि परिवार का है।
भारत में परिवार मूलभूत सामाजिक-आर्थिक इकाई है, जिसे संस्कृति मजबूत बनाती है। यह अपने सदस्यों, युवा और वृद्धों दोनों की सामाजिक सुरक्षा की देखभाल करती है। नया कानून पश्चिम के कानूनों की तर्ज पर बनाया गया है, लेकिन उसमें पृष्ठिभूमि की भिन्नता पर विचार नहीं किया गया। पश्चिम में जहा भारतीय धारणा जैसे परिवार नहीं हैं, वहां वृद्ध, अशक्त और बेरोजगार लोगों की सामाजिक सुरक्षा की देखभाल राज्य द्वारा की जाती है।
भारत में परिवार ही अपनी बिरादराना या सामुदायिक जुड़ावों के साथ सामाजिक पूंजी का रूप लेता है और वही वास्तविक सामाजिक सुरक्षा कवच बनता है। भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम), बेंगलुरू के प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन ने लेख में कहा है- "सीमित सामाजिक सुरक्षा और एक विशाल असंगठित श्रमिक दल के साथ, सामाजिक पूंजी परिवार एवं सामुदायिक जुड़ाव भारत में वृद्ध लोगों के लिए सर्वोत्तम सुरक्षा सुरक्षा कवच है। इस पूंजी का परिपोषण करके ही देश को सामाजिक संकट से बचाया जा सकता है।"
उच्चतम न्यायालय ने स्वयं महसूस किया है कि धारा 498-क में दहेज-विरोधी प्रावधान जैसे इकतरफा कानूनों का दुरुपयोग किया जा रहा है और घरेलू हिंसा अधिनियम जैसा नया कानून परिवारों को बर्बाद करने के लिए ही बनाया गया लगता है। ये कानून उस बहू को परिवार तोड़ने का निमंत्रण देते हैं, जो अपने पति के माता-पिता की सामाजिक सुरक्षा में योगदान करना नहीं चाहती है।
यह कानून सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ देता है। उस स्थिति में सरकार को सामाजिक सुरक्षा के इतने विशाल बोझ को संभालना पड़ेगा, जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। जो सरकार अपने ही साधारण कार्यो को संभाल नहीं सकती, उसे परिवार के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने देना चाहिए। लेकिन इस बात को समझने के लिए समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र, दोनों के संबंध में एक भारतीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। यह कार्य हमारे उन समाजशास्त्रियों तथा अर्थशास्त्रियों के लिए मुश्किल जरूर है, जो भारत को समझने के लिए पश्चिम की ओर ताकने के लिए तत्पर रहते हैं।
(प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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