रंग लाई गांधीगिरी, गज़ा पहुँचा कारवाँ

रंग लाई गांधीगिरी, गज़ा पहुँचा कारवाँ
गज़ा में ख़राब स्थिति में रह रहे फ़लस्तीनीयों के समर्थन और उनके लिए सहायता सामग्री लेकर रवाना हुआ गज़ा कारवाँ आख़िरकार गज़ा पट्टी पहुँच गया है. ये कारवाँ दो दिसंबर को दिल्ली के राजघाट से रवाना हुआ था. तीस दिनों के सफ़र के बाद ये कारवाँ पाकिस्तान, ईरान, तुर्की, सीरिया, लेबनान, मिस्र को पार करते हुए गज़ा पहुँचा.

इस कारवाँ में विभन्न देशों के सवा सौ लोग हैं, जिनमें से 50 लोग भारत के हैं. लेकिन इस कारवाँ को रास्ते में परेशानियाँ झेलनी पड़ी. इस कारवाँ को 10 दिनों तक मिस्र सरकार ने वीज़ा ही नहीं दिया. ये काफ़िला सीरिया में 10 दिनों तक पड़ा रहा. ये काफ़िला 27 दिसंबर को गज़ा पहुँचने वाला था. इस कारवाँ के साथ मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार ने बीबीसी को बताया कि मिस्र की सरकार की बेरुख़ी के कारण काफ़ी समस्या हुई.

अल हरीश नाम के शहर में इस कारवाँ को रोक लिया गया और उन्हें आगे जाने की अनुमति नहीं मिली. इसके विरोध में हवाई अड्डे पर ही गांधीवादी संदीप पांडे के नेतृत्व में कारवाँ में शामिल लोग भूख हड़ताल पर बैठ गए.

हवाई अड्डे पर ही गांधी जी के नाम पर नारे लगने लगे, रघुपति राघव राजा राम गाना गाया जाने लगा और संदीप पांडे वहीं चरखा लेकर सूत कातने बैठ गए. वहाँ मौजूद मिस्र के अधिकारी इससे परेशान हुए और उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बात की. क़रीब एक घंटे बाद कारवाँ को गज़ा जाने की अनुमति मिल गई. गज़ा पहुँचने के बाद बीबीसी से बातचीत में सुनील कुमार ने बताया कि देर रात होने के बावजूद गज़ा में बड़ी संख्या में लोग कारवाँ का स्वागत करने के लिए मौजूद थे.

उन्होंने बताया, "कारवाँ के वहाँ पहुँचते ही माहौल बहुत भावुक हो गया. कई लोग वहाँ की स्थिति देखकर रोने लगे. दिल्ली के कई छात्रों के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे." सुनील कुमार ने बताया कि कारवाँ को जिस तरह कई देशों में समर्थन मिला, उससे वे काफ़ी अभिभूत हैं. उन्होंने कहा, "शून्य से भी कम तापमान में लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर खड़े रहते थे. अपने अब तक के जीवन में मैंने ऐसा सैलाब कम देखा है, ऐसी दीवानगी कम देखी है."

इस काफ़िले में कई ऐसे लोग शामिल हैं, जिनके छोटे-छोटे बच्चे हैं. एक सज्जन ऐसे हैं, जिनकी शादी छह महीने पहले हुई है. लेकिन गज़ा कारवाँ को भारत सरकार की ओर से भी मदद नहीं मिली. और तो और तो जो सहायता सामग्री आयोजकों ने भारत में जुटाई थी, वो उन्हें यहाँ लाने की अनुमति नहीं मिली.

गांधीवादी संदीप पांडे हवाई अड्डे पर चरखा लेकर बैठ गए

लेकिन ईरान के सांसदों ने अपने वेतन में कटौती करके राशि दी और अन्य देशों ने एंबुलेंस, चिकित्सा उपकरण, सौर्य जेनरेटर जैसी चीज़ें दी, जो जहाज़ में लादकर पहुँचाई गई है. इसी कारवाँ में शामिल हैं बिराज पटनायक, जो सुप्रीम कोर्ट में भोजन का अधिकार आयोग के सलाहकार हैं.

बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि गज़ा में फ़लस्तीनियों की मानवीय स्थिति का जो मुद्दा है, उसने उन्हें काफ़ी झकझोरा और वे इस कारवाँ का हिस्सा बने. उन्होंने बताया, "मेरे लिए यह अभूतपूर्व अनुभव था. अलग-अलग देशों में लोगों की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी थी." बिराज ने बताया कि ईरान ने इस कारवाँ को सबसे ज़्यादा मदद की और कारवाँ के लोगों से मिलने राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद भी पहुँचे.

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