भारतीय कम्पनी ने नेपाल से 48000 डॉलर की मांग की

काठमांडू, 5 दिसम्बर (आईएएनएस)। भारत की सरकारी स्वामित्व वाली मुद्रा छापने वाली कम्पनी, सिक्युरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने नेपाल से कहा है कि वह उसे 48,000 डॉलर की राशि का भुगतान करे, जिसे उसने नेपाल सरकार के साथ हुए एक पासपोर्ट करार के बाद खर्च किया था। बाद में राजनीतिक दबाव के कारण नेपाल सरकार ने उस करार को रद्द कर दिया था।

भारतीय कम्पनी के अनुसार वह नेपाल की कार्यवाहक सरकार से उस धनराशि की मांग कर रही है, जिसे उसने नई दिल्ली में एक नेपाली शिष्टमंडल की मेजबानी पर तथा 30 लाख आधुनिक नेपाली पासपोर्ट छापने के लिए आवश्यक सामग्रियों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार से खरीदने पर खर्च किया था।

काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने इस बात की पुष्टि की है कि कम्पनी ने नेपाल के विदेश मंत्रालय के साथ भुगतान के इस मुद्दे को उठाया है। नेपाल ने अप्रैल में इस सौदे को रद्द कर दिया था और एक अंतर्राष्ट्रीय निविदा के तहत इस ठेके को एक फ्रेंच कम्पनी को दे दिया था।

पासपोर्ट विवाद जनवरी में उस समय खड़ा हुआ था, जब नेपाल सरकार ने 30 लाख नेपाली पासपोर्ट छापने के लिए छह वर्ष पहले शुरू हुई निविदा प्रक्रिया को रद्द कर दिया था।

भारत के विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा के अनुरोध पर भारतीय कम्पनी को पासपोर्ट छापने का ठेका दे दिया गया था। कृष्णा ने नेपाली पासपोर्ट के बारे में भारत की गम्भीर सुरक्षा चिंताओं को जाहिर किया था।

ज्ञात हो कि 1950 में हुई एक संधि के अनुसार भारत और नेपाल एक-दूसरे के नागरिकों के साथ अपने नागरिकों जैसा व्यवहार करते हैं। नेपाली पासपोर्ट धारी किसी व्यक्ति को भारत आने के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं है और वह भारत में बैंक खाता खोल सकता है, सम्पत्ति खरीद सकता है और कोई नौकरी कर सकता है।

नेपाली पासपोर्ट की चोरी की खबरों और भारतीय शहरों में नेपाल के रास्ते आतंकी हमलों में हुई बढ़ोतरी के बाद भारत ने नेपाल को ऐसा करने का सुझाव दिया था ताकि पासपोर्ट में सुरक्षा सम्बंधी विशेष खासियतें जोड़ी जा सकें, जिसके साथ छेड़छाड़ करने या उसकी नकली प्रति बनाने की गुंजाइश न रहे।

लेकिन नेपाल की गठबंधन सरकार ने अपने सहयोगी दलों के साथ ही विपक्षी माओवादियों की ओर से बने दबाव के बाद इस करार को रद्द कर दिया था।

लेकिन ऐसा नहीं लगता कि भारतीय कम्पनी इस धनराशि को इतने जल्द हासिल करने में सफल हो जाएगी। क्योंकि नेपाल सरकार से इस बारे में सम्पर्क किए हुए उसे पूरे दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन सरकार ने इस ओर अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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