भोपाल गैस त्रासदी : जहर ने पहाड़ बना दी जिंदगी

Bhopal gas tragedy
भोपाल। भोपाल गैस त्रासदी में रिसी गैस जहां हजारों लोगों को अपना निवाला बना चुकी है, वहीं हजारों ऐसे लोग हैं जिन्हें अपनी जिंदगी पहाड़ लगने लगी है क्योंकि उन्हें बीमारी ने अपनों से ही दूर कर दिया है।

भोपाल में दो-तीन दिसम्बर 1984 की रात को यूनियन कार्बाइड संयंत्र से रिसी जहरीली गैस ने हजारों लोगों को अपने आगोश में ले लिया था और बच्चों को अनाथ, युवाओं का बेरोजगार तो बूढ़े मां-बाप की लाठी छीन ली थी। बीते 26 वर्षो में हालात सुधरे नहीं है, बीमार और बीमार हुआ है और काल के गाल में समाता जा रहा है।

जहरीली गैस के असर को गुफरान खान को देखते ही समझा जा सकता हैं। उसकी दोनों आंखों की रोशनी जा चुकी है। जब हादसा हुआ था तब वह महज छह वर्ष का था। माता- पिता के साथ भरा पूरा परिवार था, वक्त गुजरने के साथ उसकी आंखों पर जहरीली गैस का ऐसा असर हुआ कि पहले जलन और फिर रोशनी जाती रही। गैस से मिले अंधेरे के चलते उसका घर तो बस नहीं पाया लेकिन दूसरी ओर अपनों ने ही किनारा कर लिया। वह पांच रुपए किलों की दर से सुपारी काट कर जिंदगी काट रहा है। उसे आंखें गंवाने की कीमत सिर्फ 25 हजार मिली है।

इसी तरह यूनियन कार्बाइड संयंत्र के ठीक सामने बसी आवासीय बस्ती जे. पी. नगर में रहने वाली प्रमिला का तो गैस से मिली बीमारी ने ससुराल से नाता ही तोड़ दिया है। वे जब करीब दस साल की थी तब यह हादसा हुआ था और सबसे ज्यादा जानें इसी बस्ती के लोगों की गई थी। तब प्रमिला ने भी कई अपने लोगों को खोया था।

वक्त गुजरने के साथ प्रमिला पर भी बीमारी ने अपना असर दिखाया। इसके बावजूद प्रमिला जब 18 वर्ष की उम्र पार कर गई तो उनकी शादी हुई। पति सरकारी कर्मचारी था और जिंदगी आम लोगों की ही तरह चल रही थी। वह बताती है कि बढ़ती खांसी और आंखों की कम होती रोशनी के कारण बार-बार इलाज कराना पड़ा। इलाज पर होने वाले खर्च के कारण ससुराल के लोगों ने उसे परेशान करना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं उसे बीमारी होने के ताने भी मिले। आखिर में उसे इलाज कराने के नाम पर मायके भोपाल भेज दिया गया और वह तभी से यहीं है।

गोविंदपुरा इलाके में रहने वाले अकील खान के लिए तो जिंदगी का रंग ही बेनूर हो चुका है। गैस ने उनके दोनों गुर्दों को खराब कर दिया है। इस बीमारी ने उन्हे मुफलिसी के रास्ते पर पहुंचा दिया है। उन्हें हर सप्ताह तीन बार डायलिसिस कराना होता है, लंबे संघर्ष के बाद सरकारी अस्पताल में दो बार यह सुविधा मिल जाता है लेकिन एक बार की राशि का भार उन्हें उठाना पड़ता है। उन्होंने उपचार के लिए कई लोगों से कर्ज ले रखा है, अब उनके लिए उपचार मुश्किल हो गया है।

गुफरान, प्रमिला और अकील जैसे हजारों लोग है जो उपचार के लिए संघर्ष कर रहे है, मगर गैस पीड़ितों के लिए बने अस्पताल भव्य इमारतों और आधुनिक उपकरणों की प्रयोगशाला बन कर रह गए हैं। यहां चिकित्सकों की कमी वर्षो से है और दवाएं पाना आसान नहीं रह गया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।भोपाल, 1 दिसम्बर (आईएएनएस)। भोपाल गैस त्रासदी में रिसी गैस जहां हजारों लोगों को अपना निवाला बना चुकी है, वहीं हजारों ऐसे लोग हैं जिन्हें अपनी जिंदगी पहाड़ लगने लगी है क्योंकि उन्हें बीमारी ने अपनों से ही दूर कर दिया है।

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