कैसे बुझी लालू की 20 साल पुरानी लालटेन?

Lalu Prasad Yadav
पटना। बिहार विधानसभा चुनावों के परिणाम पूरी तरह नीतीश के पक्ष में आएंगे, ये तो सभी कह रहे थे, लेकिन राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की नींदें उड़ा देंगे, इसका अंदाजा खुद लालू को नहीं था। 'लालटेन' बुझ चुकी है, घर व पार्टी कार्यालय में अंधेरा छा गया है और कार्यकर्ता रूपी मच्‍छर काटने लगे हैं। आइये देखते हैं, आखिर लालू की लालटेन बुझी कैसे।

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पंद्रह साल पहले बिहार में मुख्‍यमंत्री बनने के बाद लालू यादव पूरे बिहार में प्रभावशाली थे, लेकिन उनका प्रभाव धीरे-धीरे दबदबा बन गया और फिर दबंगई। बिहार में अपराध चरम पर आ गया। इसके समानांतर चलता रहा लालू की राजनीति में परिवारवाद। लालू की पत्‍नी राबड़ी देवी, जो अयोग्‍य करार दी जा चुकी थीं, उन्‍हें मुख्‍यमंत्री बनाया गया।

फिर लालू यादव के साले सुभाष यादव और साधु यादव। दोनों राजद में आये और पूरे बिहार में छा गए। देखते ही देखते दोनों सांसद बन गए। साथ में लालू भी केंद्रीय मंत्री बन गए। जरा सोचिए राजनीति में इतना सशक्‍त परिवार आज पूरी तरह बिखर गया है। आज सुभाष और साधु दोनो लालू से अलग हो चुके हैं। इस विधानसभा चुनाव में भी वो हार गए।

इन सबके कई बड़े कारण हैं-

1. लालू हमेशा परिवार पर ध्‍यान देते रहे, पार्टी और कार्यकर्ताओं पर नहीं।
2. सत्‍ता में रहते वक्‍त लालू ने सिर्फ पैसा कमाने की सोची, विकास की नहीं।
3. जितना पैसा नीतीश को मिलता है, लगभग उतना ही लालू को मिलता था, वो पैसा कहां जाता था।
4. लालू की पार्टी में गुटबाजी और एक दूसरे के प्रति द्वेश की भावना से पार्टी में फूट पड़ती रही और लालू सोते रहे।
5. केंद्रीय रेल मंत्री जैसे पद पर पहुंचने के बाद भी लालू ने अपनी पद की गरिमा नहीं समझी। वहां भी खेल किए।

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