यूपी सरकार की लापरवाही खा गई 60 हजार नौकरियां

आपको यह जानकर हैरत होगी कि त्‍तर प्रदेश सरकार की लापरवाही की वजह से राज्‍य से करीब 60 हजार नौकरियां छिन गईं। या फिर ये कहिए कि कपड़ा बनाने वाले 60 हजार श्रमिक बेरोजगार हो गए। यानी तीन लाख लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। आलम यह है कि ये लोग आज मजबूरी में गुजरात और महाराष्‍ट्र जाकर कम दामों पर काम कर रहे हैं।

उत्‍तर प्रदेश सरकार को खोंखला साबित करने वाले ये तथ्‍य सामने आये हैं लखनऊ विश्‍वविद्यालय के एक अध्‍ययन में। विश्‍वविद्यालय के समाज कार्य विभाग के असिस्‍टेंट प्रोफेसर डा. अनूप कुमार भारती के दिशा-निर्देशन में पीएचडी पूरी करने वाले डा. पीयूष कुमार ने अपने शोध में इन तथ्‍यों को उजागर किया है।

विश्‍वविद्यालय ने पीयूष अवस्‍थी को पीएचडी की उपाधि दी है। उनके शोध का विषय था, "कताई मिलों के कार्यरत श्रमिकों की सामाजिक, आर्थिक एवं जनांकिकीय विशेषताओं का तुल्‍नात्‍मक अध्‍ययन"। उत्‍तर प्रदेश में बेरोजगारी, जातिवाद और अशिक्षा के परिप्रेक्ष्‍य में यह शोध काफी महत्‍वपूर्ण है।

22 मिलें पूरी तरह बंद

अध्‍ययन के मुताबिक सरकार की लापरवाही के चलते मऊ, इलाहाबाद, अकबरपुर, जौनपुर, प्रतापगढ़, मेरठ और बांदा समेत कई शहरों में कुल 24 कताई मिलें थीं, जिनमें से 22 मिलें पूरी तरह बंद हो चुकी हैं। मिलें बंद होने का सबसे बड़ा कारण सरकार की अनदेखी था। इस समय सिर्फ 2 मिलें चल रही हैं।

मिलों के बंद होने का सबसे बड़ा कारण मशीनों की मरम्‍मत नहीं होना। जो मशीन एक बार जाम हुई, उसे दोबारा ठीक नहीं कराया गया। सरकार ने नई मशीनें खरीदने की जरूरत भी नहीं समझी। धीरे-धीरे सभी मिलों की मशीनें खराब हो गईं। दूसरा बड़ा कारण जातिवाद था। सवर्ण जातियों के लोगों को दलित या पिछड़ी जाति के लोगों के नीचे रहकर काम करना मंजूर नहीं था। हालांकि इसके लिए सरकार व गैर सरकारी संगठनों ने मिलकर एक ट्रेनिंग मॉड्यूल चलाया और काफी हद तक श्रमिकों के बीच जातिवाद के जहर को कम किया।

श्रमिकों को काई ट्रेनिंग नहीं

तीसरा बड़ा कारण अशिक्षा व ट्रेनिंग की कमी रहा। यहां श्रमिकों के लिए न तो कभी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित हुए और न ही उनके परिवार के लोगों की शिक्षा पर ध्‍यान दिया। इस वजह से बाल श्रम भी काफी बढ़ा।

आलम यह है कि बेरोजगार हुए श्रमिक मजदूरी कर रहे हैं। वो श्रमिक जो यहां 150 रुपए प्रति दिन पर 120 टन प्रति माह का उत्‍पादन देते थे, वो आज गुजरात और महाराष्‍ट्र में जाकर 90 रुपए तक में काम करने को तैयार हैं। वहां उनका जमकर शोषण भी किया जा रहा है। वहीं सरकार इन मिलों को निजी कंपनियों को सौंपने की तैयारी कर रही है।

शोधकर्ता डा. पीयूष अवस्‍थी का कहना है कि यदि सरकार इन्‍हीं मिलों पर पैसा खर्च करें तो इनका जीर्णोद्धार हो सकता है। इन मिलों को निजी हाथों में सौपने से अच्‍छा होगा, अगर इन्‍हें फिर से जीवित किया जाए।

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