हिमाचल के मंदिरों में मुस्लिम ताल पर मंत्रोच्चारण
विशाल गुलाटी
शिमला, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश के मंदिरों में पुजारी जब दैनिक धार्मिक रस्म पूरा करते समय पवित्र मंत्रों का उच्चारण करते हैं, उसी समय मुस्लिम संगीतज्ञों का एक समूह वहां पारंपरिक ढोल, शहनाई और तुरही बजाता है।
राज्य के प्रमुख मंदिरों में ऐसा दृश्य आमतौर पर देखने को मिलता है। जीविकोपार्जन का आसान तरीका होने के कारण यह पीढ़ियों से सामाजिक संरचना का हिस्सा बनता रहा है।
ऊना जिले का चिंतपूर्णी मंदिर, बिलासपुर जिले का नैना देवी मंदिर हो या कांगड़ा जिले के ज्वालाजी और चामुण्डा मंदिर हों, सभी जगह मुस्लिम समुदाय के लोग शहनाई, तुरही और ढोल बजाकर पुजारियों को धार्मिक रस्म पूरी करने में मदद करते हैं। वहीं हिंदू भक्त पंक्तिबद्ध होकर प्रार्थना करते हैं।
विशेष दायित्व निभा रहे एक अधिकारी प्रेम प्रसाद पंडित ने आईएएनएस को बताया, "राज्य के अधिकांश मंदिरों में मुस्लिम संप्रदाय के लोग धार्मिक रस्म पूरी करने में खासतौर से मदद करते हैं। दैनिक प्रार्थना सत्र में वे वाद्ययंत्र बजाते हैं। इनमें से अधिकांश यहां पीढ़ियों से यह कार्य कर रहे हैं।"
पंडित ने कहा कि कुछ मुस्लिम लोग अच्छे दस्तकार हैं। उन्होंने कहा, "मंदिरों के लिए लकड़ी पर नक्काशी और लघु चित्रकारी के लिए हम मुस्लिम दस्तकारों को नियुक्त करते हैं।"
धर्मशाला के निकट खानियारा गांव के एक पारंपरिक ढोल वादक रफीक मोहम्मद ने आईएएनएस को बताया, "हम धर्मशाला और आसपास के मंदिरों में हर सुबह और शाम नियमित रूप से जाते हैं और ढोल एवं अन्य वाद्ययंत्र बजाते हैं। हमारे पूर्वज भी यह कार्य किया करते थे।"
उन्होंने बताया कि मंदिर के अधिकारी उन्हें चढ़ावे में से कुछ हिस्सा देते हैं।
मोहम्मद ने कहा, "हिंदू लोग हमें धार्मिक अनुष्ठान एवं अन्य रस्मों के मौके पर अपने घर बुलाते हैं।"
चम्बा कस्बे में मक्के की फसल में फूल आने पर हर साल लगने वाले लोकप्रिय मिजर मेले में मुस्लिम लोग अहम भूमिका निभाते हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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