फ़ैसले से पहले अयोध्या में सुरक्षा कड़ी

Ayodhya

रेहान फ़ज़ल, बीबीसी संवाददाता, अयोध्या से

अयोध्या विवाद में 24 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के फ़ैसले को लेकर अयोध्या में सुरक्षा के ज़बर्दस्त इंतज़ाम किए गए हैं. बुधवार को सुरक्षाबलों ने फ्लैग मार्च किया और गुरुवार को भी सुरक्षाबलों के मार्च की संभावना व्यक्त की जा रही है.

प्रशासन ने जगह जगह नाके लगाए हैं. अफ़वाहें न फैले इस दृष्टि से अयोध्या समेत देशभर में एसएमएस और एमएमएस पर रोक लगा दी गई है. हालांकि शहर में तनाव नहीं है लेकिन एहतियात बरती जा रही है. अयोध्या में बाज़ार खुले हुए हैं लेकिन भीड़ नहीं हैं. बुधवार से ही ज़िले की सीमाओं को सील कर दिया है शहर में प्रवेश करनेवाले सभी वाहनों की जांच की जा रही है.

दूसरी ओर प्रशासन मुसलमानों को आश्वस्त कर रहा है कि चिंता की कोई बात नहीं है. प्रशासन ने अयोध्या के लोगों से अपील की कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को सम्मान देते हुए क़ानून व्यवस्था को कायम रखा जाए. पुलिस ने नागरिकों से इस फ़ैसले के बाद शांति व क़ानून व्यवस्था बनाए रखने का भी आह्वान किया है.

सुनवाई की संभावना

अयोध्या मामले पर फ़ैसले को टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई अपील पर गुरुवार को सुनवाई की संभावना है. हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ ये अपील बुधवार को दाख़िल हुई थी लेकिन जिस बेंच के सामने इसका उल्लेख किया गया, उसने कहा कि यह उसके क्षेत्राधिकार से बाहर है इसलिए समझा जाता है कि अपील को अब दोबारा दूसरी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए रखा जाएगा.

अयोध्या में विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ संबंधी मुक़दमे का फ़ैसला टालने के लिए ये अपील एक प्रतिवादी रमेश चंद्र त्रिपाठी ने दाख़िल की है. ये वही याचिका है जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था. ग़ौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ इस संबंध में 24 सितंबर को अयोध्या-रामजन्मभूमि विवाद पर फ़ैसला सुनाने जा रहा है.

उसे रोकने के लिए ये याचिका रमेश चंद्र त्रिपाठी ने दायर की थी और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि सांप्रदायिक संवेदनशीलता और राष्ट्रमंडल खेलों को देखते हुए फ़ैसला टाल दिया जाए. इसके पहले रमेश चंद्र त्रिपाठी ने हाईकोर्ट में भी ये याचिका दायर की थी लेकिन अदालत ने उसे ख़ारिज कर दिया था और याचिकाकर्ता पर 50 हज़ार रुपए का जुर्माना लगा दिया था.

फ़ैसले की घड़ी

ग़ौरतलब है कि हाईकोर्ट को उस स्थान के मालिकाना हक़ पर फैसला देना है जहां छह दिसंबर को विवादित मस्जिद तोड़कर अस्थायी राम मंदिर बना दिया गया था. वैसे तो हाईकोर्ट को दर्जनों विषयों पर फ़ैसला देना है, लेकिन दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि क्या विवादित इमारत एक मस्जिद थी, वह कब बनी और क्या उसे बाबर अथवा मीर बाक़ी ने बनवाया?

इसी के साथ कुछ तकनीकी या क़ानूनी सवाल भी हैं. मसलन क्या जिन लोगों ने दावे दायर किए हैं , उन्हें इसका हक़ है? अदालती इतिहास में यह न केवल 60 साल तक लंबा चलने वाला बल्कि एक ऐसा मुक़दमा है जिसमें दोनों पक्षों की भावनाएं जुड़ गई हैं. अदालत के संभावित फ़ैसले को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने ज़रुरी सुरक्षा व्यवस्था की हैं.

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