अयोध्या विवाद : फैसला 28 सितम्बर तक टला
नई दिल्ली/अयोध्या। अयोध्या के बहुचर्चित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर 24 सितम्बर यानी शुक्रवार को आने वाला बहुप्रतीक्षित फैसला तो 28 सितम्बर तक टल गया है। सेवानिवृत्त नौकरशाह रमेश चंद्र त्रिपाठी ने इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने यह फैसला सुनाया है।
लेकिन दशकों पुराने इस विवाद पर अदालत के रुख को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों व पक्षों में से अधिकांश ने असंतोष जताया। सिर्फ कांग्रेस और पक्षकार निर्मोही अखाड़े ने ही इसका स्वागत किया। इस विवाद पर 24 सितम्बर को आने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति आरवी रवींद्रन और न्यायमूर्ति एचएल गोखले की पीठ ने फिलहाल 28 सितम्बर तक के लिए रोक लगा दी।
याचिका में अयोध्या विवाद पर फैसला टालने और इस जटिल मामले का अदालत से बाहर शांतिपूर्ण समाधान निकालने की संभावना तलाशने के लिए संबंधित पक्षों को निर्देश देने की अपील की गई थी। याचिका में कम से कम तीन से 14 अक्टूबर तक होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों तक इस फैसले को टालने की भी अपील की गई थी।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की जानकारी देते हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा, "याची रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका पर दो न्यायाधीशों की पीठ ने सुनवाई की। दोनों न्यायमूर्तियों में मतभेद था। एक न्यायमूर्ति याचिका खारिज करने के पक्ष में थे जबकि दूसरे का मत था कि फैसले पर रोक लगाई जाए और सम्बंधित पक्षों को नोटिस दिया जाए।"
उन्होंने कहा, "अब इस मामले की अगली सुनवाई 28 सितम्बर को होगी। अदालत को इस बात की जानकारी है कि लखनऊ खंडपीठ के एक न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसलिए मामले पर 28 तारीख को सुनवाई होगी। सभी पक्षों को नोटिस जारी किया गया है और अटार्नी जनरल को भी इस दिन अदालत में उपस्थित रहने को कहा गया है।"
उन्होंने कहा, "अदालत को ऐसा लगा कि सर्वोच्च न्यायालय के कहने पर इस मामले के सम्बंधित पक्ष शायद बातचीत के जरिए विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकालने का प्रयास करें।"
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का कांग्रेस और निर्मोही अखाड़े ने स्वागत किया है। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि पार्टी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करती है। उन्होंने कहा, "कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सोच यही है कि अयोध्या जैसे मसलों का समाधान सम्बंधित पक्षों व समुदायों के बीच वार्ता से होना चाहिए। लेकिन अदालत के फैसले का सम्मान भी होना चाहिए।"
विवादित स्थल पर मालिकाना हक की लड़ाई में निर्मोही अखाड़ा प्रमुख पक्षकार है। इसकेमहंत भास्कर दास ने कहा कि वह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हैं। "मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि इससे दोनों पक्षों को आपसी विवाद सुलझाने के लिए बातचीत का समय मिल जाएगा।"
दास ने कहा, "हम अपील करते हैं कि जनता अदालत के फैसले की प्रतीक्षा करे और अदालत का जो भी निर्णय हो उसका सम्मान करते हुए शांति और आपसी सद्भाव बनाए रखे।" वरिष्ठ वकील और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता रविशंकर प्रसाद ने तो सेवानिवृत्त नौकरशाह रमेश चंद्र त्रिपाठी की नीयत पर ही सवाल उठा दिए।
प्रसाद ने समाचार चैनल एनडीटीवी से बातचीत में कहा, "उच्च न्यायालय ने सुलह के जरिए मामले को सुलझाने की कोशिश की थी लेकिन उस वक्त वह (त्रिपाठी) अदालत में हाजिर नहीं हुआ। हो सकता है कि राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर कोई कुछ खेल कर रहा है।" प्रसाद ने चैनल से बातचीत से पहले ही स्पष्ट कर दिया कि वह भाजपा नेता के रूप में नहीं बल्कि एक वकील की हैसियत से बात कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, "कैसे कोई अजनबी जो कि गंभीर नहीं है, मसले को बाधित कर सकता है। उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान वह कभी भी हाजिर नहीं हुआ।" अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ द्वारा दिए जाने वाले फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 28 सितम्बर तक लगाई गई रोक की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने आलोचना की है।
लोकसभा में माकपा के नेता बासुदेव आचार्य ने आईएएनएस से फोन पर बातचीत में कहा, "सर्वोच्च न्यायालय को फैसला टालना नहीं चाहिए था। जो भी फैसला होता, दोनों पक्ष उसे मानने को बाध्य होते।" इस मामले को सुलह समझौते के जरिए हल किए जाने की संभावनाओं को खारिज करते हुए आचार्य ने कहा, "इस मामले में सुलह की कोई संभावना ही नहीं है।"
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एस. क्यू. आर. इलियास ने कहा कि उन्हें अदालत के फैसले से निराशा हुई। उन्होंने कहा, "यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। जनता शुक्रवार को फैसला आने का इंतजार कर रही थी।" सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के वकील जफरयसार जिलानी ने लखनऊ में कहा, "मुझे नहीं लगता कि अब सुलह की कोई संभावना है।"
उन्होंने कहा कि अयोध्या मामले में त्रिपाठी एक महत्वहीन व्यक्ति है। "वह गंभीर नहीं हैं।" उन्होंने कहा कि जो भी हो सर्वोच्च न्यायालय का फैसले का सम्मान होना चाहिए। इस मामले में मुस्लिम पक्ष के सबसे पुराने वादी हाशिम अंसारी ने अपनी प्रतिकिया देते हुए कहा कि दुनिया भर के मुसलमान अयोध्या के फैसले को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं चाहे यह फैसला उनके खिलाफ ही क्यों न हो।
उन्होंने कहा, "मैं सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा। अयोध्या विवाद पर सभी मुसलमान हर कीमत पर अदालत का आखिरी फैसला मानेंगे, भले ही उनके खिलाफ ही आए, लेकिन हम चाहते हैं कि इस मसले का निपटारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में ही हो।"












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