हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी है नितीश सरकार?
पटना। बिहार के जंगलों में बरामद शव की पहचान राज्य पुलिस ने कर ली है। पुलिस की ओर से इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि बरामद शव नक्सलियों द्वारा बंधक बनाए गए 4 पुलिसकर्मियों में से एक का ही है। लुकास टेटे नाम के इस पुलिसकर्मी को राज्य पुलिस ने बिहार सैन्य बल का सुरक्षाकर्मी बताया है। पुलिसकर्मी के शव के पास से नक्सलियों का एक पर्चा बरामद हुआ था जिसमें पुलिसकर्मी को हवलदार बताया गया था।
इस जघन्य हत्याकांड के बाद नक्सलियों की गिरफ्त में फंसे शेष 3 पुलिसकर्मियों की सुरक्षा को लेकर खतरा गहरा गया है। लेकिन राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार ने अब तक इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया है। राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर शनिवार की शाम 4 बजे एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है। कुल मिलाकर अब तक का ये इकलौता कदम है जिसे राज्य सरकार की तरफ से उठाया गया कदम कहा जा सकता है।
राजनीतिक हथकंडा तो नहीं
इस पर लाख टके का सवाल बनता है कि जब नक्सलियों द्वारा दी गयी तीसरी समय-सीमा भी शुक्रवार की सुबह 10 बजे खत्म हो रही है तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस मसले पर सर्वदलीय बैठक शनिवार की शाम को क्यों बुला रहे हैं। पुलिसकर्मियों की जानों का फैसला तो राज्य सरकार की प्राथमिकताओं की सूची में पहले नंबर पर होना चाहिए। फिर नितीश पुलिसकर्मियों की जानों से जुड़े मसले पर ये राजनीति क्यों कर रहे हैं?
जाहिर है, राज्य सरकार के मामले को गंभीरता से ना लेने की वजह से ही एक पुलिसकर्मी की जान जा चुकी है। अब शेष 3 पुलिसकर्मियों की जान बचाने के लिए सरकार को हर संभव प्रयास करना चाहिए। सरकार की अब तक की लापरवाही से तो लोगों मे यही संदेश पहुंच रहा है कि सरकार को इन मामूली पुलिसकर्मियों की जान की कोई परवाह नहीं है।












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