नेपाल में फिर नहीं हो सका नए प्रधानमंत्री का निर्वाचन
काठमांडू, 23 अगस्त (आईएएनएस)। नेपाल की संसद में सोमवार को प्रधानमंत्री पद के निर्वाचन के लिए पांचवीं बार हुए मतदान के बावजूद नए प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं हो सका। माओवादी पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल 'प्रचंड' संसद में साधारण बहुमत हासिल करने में एक बार फिर विफल साबित हुए।
तराई की जातीय पार्टियों के समर्थन की उम्मीद के साथ चुनाव में उम्मीदवार बने प्रचंड को 599 सदस्यीय संसद में केवल 246 वोट हासिल हो सके।
पिछले चार बार के चुनाव में बहुमत का समर्थन हासिल करने में विफल रहे 55 वर्षीय पूर्व गुरिल्ला नेता ने मीडिया से कहा था कि उनको तराई की चार मधेशी पार्टियों का समर्थन हासिल है। इस समूह के पास 82 सांसद हैं।
बहरहाल प्रचंड के खिलाफ 111 सांसदों ने मतदान किया और 206 सांसदों ने चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया।
माओवादियों के दबाव के कारण प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने जून में त्यागपत्र दे दिया था। प्रचंड की पार्टी के 236 सांसद हैं और उनको प्रधानमंत्री पद हासिल करने के लिए केवल 64 अन्य सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है।
मधेशी पार्टियों के सांसदों का बड़ा हिस्सा और कम्युनिस्ट पार्टी के 109 सांसद मतदान से अनुपस्थित रहे।
प्रधानमंत्री पद के चुनाव से अपना उम्मीदवार हटा लेने वाले कम्युनिस्टों ने सोमवार को भी पहले का कारनामा दोहराया और कहा कि उम्मीदवारों ने उनकी मांगों को मानने से इंकार कर दिया है।
उनकी मांगें मुख्य रूप से माओवादियों को लक्ष्य करके तैयार की गई हैं। इनमें पूर्व गुरिल्लाओं से अपने प्रशिक्षण शिविर बंद करने, सैन्य इकाइयों को विखण्डित करने और जनयुद्ध के नाम कब्जाई गई सार्वजनिक संपत्ति को वापस करने को कहा गया है।
लंबे समय से चले आ रहे संकट से नाराज अन्य पार्टियों ने संसद के बहिष्कार करने और एक विरोध आंदोलन शुरू करने की धमकी दी है।
लंबे समय से जारी गतिरोध से बाध्य होकर राष्ट्रपति रामबरन यादव ने भी पार्टियों से सहमति कायम करने को कहा है।
नेपाल में शांति प्रक्रिया को लागू करने में सहयोग दे रही संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी का कार्यकाल अगले महीने खत्म होने से एक नया संकट पैदा होने वाला है।
माओवादियों की पीपुल्स लिबरेश आर्मी के लड़ाकों और हथियारों के साथ ही सरकारी सेना की क्षमता की निगरानी करने वाले 'नेपाल में संयुक्त राष्ट्र मिशन' (यूएनएमआईएन) का भविष्य अनिश्चित हो गया है क्योंकि सेना और सत्तारूढ़ पार्टियों ने कहा है कि मिशन का कार्यकाल नहीं बढ़ाया जाना चाहिए।
केवल माओवादी चाहते हैं कि मिशन नेपाल में बना रहे और उन्होंने उसे बाहर करने की स्थिति में शांति प्रक्रिया टूटने की धमकी दी है।
इस लंबे संकट से अगले वर्ष तक नया संविधान लागू करने की नेपाल की क्षमता पर नए संदेह पैदा हो गए हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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