सपने, हिम्मत और हौसला

सपने, हिम्मत और हौसला
विनीत खरे

बीबीसी संवाददाता, मुंबई

मुंबई के 16 वर्षीय किशोर के दसवीं की परीक्षा में 84 फ़ीसदी अंक हासिल करने पर उनका परिवार खुशी से झूम उठा. आप सोच रहे होंगे कि इसमें इतनी खुशी की क्या बात है. चलिए आपको मिलवाते हैं 16 वर्षीय अनीस फ़ारूकी से. मुश्किल परिस्थितियों में जीवन के प्रति आशावान ऐसे किशोर से आप शायद ही मिले हों.

मुंबई के जोगेश्वरी इलाके के वैशाली नगर के अपने कमरे में लेटे अनीस के सिरहाने पर एक बड़ी सी वेंटिलेटर मशीन रखी है. पिछले 11 वर्षों से अनीस के जीवन के तार वेंटिलेटर मशीन से ही जुड़े हुए हैं. दरअसल अनीस बचपन से ही एक खतरनाक बीमारी कंजेनिटल मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी से पीड़ित हैं. इसमें शरीर की मांसपेशिया कमज़ोर होने लगती हैं और शरीर का ढांचा टेढ़ा-मेढ़ा हो जाता है.

अनीस ज़्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता, शब्द मुँह से ठीक से नहीं निकलते और भी कई तरह की तकलीफ़ें होती है. लाखों रुपए महंगी इस वेंटिलेटर मशीन से निकले पाइप उसके गले में किए गए एक छेद से जुड़े हुए हैं.

मशीन की मदद से अनीस सांस ले पाता है. मशीन को ठंडा रखने के लिए कमरे में एसी लगा हुआ है. अनीस हर दिन लगभग 16 घंटे उसी मशीन से जुड़ा रहता है. अनीस ने अपनी दसवीं कक्षा की परीक्षा भी इसी हालात में दी. उसे जितना भी वक्त मिला, उसने जमकर पढ़ाई की. उसके स्कूल की तरफ़ से उसे हर संभव मदद मिली.

अनीस के परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उन्हें पता चला कि अनीस ने करीब 84 प्रतिशत अंकों के साथ अपने स्कूल में टॉप किया है. डॉक्टरों की माने तो अनीस की जीवन की रफ़्तार कभी भी रुक सकती है. लेकिन ये तो शायद कल की बात है. अनीस को आज में विश्वास है.

अनीस का कहना है, “मुझे बुरा लगता है जब लोग मेरी हालत पर तरस खाते हैं. जब मैं उनसे अच्छा कर सकता हूँ तो मुझे अलग क्यों कहा जाता है. मैं खुद को दूसरों से अलग नहीं मानता. मैं कभी हतोस्ताहित नहीं होता हूँ. मेरा कहना है कि ये दुनिया मुझसे है."" इस हालात में ऐसी बातें करना शायद सभी के बस की बात नहीं.

आत्मविश्वास

अनीस की इस कामयाबी और जीवन के प्रति उसके विश्वास को देखकर उसके दोस्त, डॉक्टर, स्कूल की प्राध्यापिकाएँ सभी हैरान हैं. वर्षों से उसका इलाज कर रहे डॉक्टर भूपेंद्र अवस्थी कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में अनीस जैसा लड़का नहीं देखा है जिसकी जीवन के प्रति ये सोच है.

वो कहते हैं, “अनीस को पता है कि उसकी बीमारी कितनी ख़तरनाक है और उसके क्या परिणाम हो सकते हैं. लेकिन इस उम्र में इतनी समझदारी मैने आजतक किसी इंसान में नहीं देखी."" अनीस के विद्यालय स्कॉलर हाईस्कूल की प्राध्यापिका शकीला मिर्ज़ा कहती हैं कि आज के माहौल में जहाँ बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं, उनके लिए अनीस मिसाल है.

अनीस के पिता अज़ीज फ़ारूकी बताते हैं कि अनीस के पैदा होने के छह महीने के अंदर ही उन्हें पता चल गया था कि बच्चे के साथ कुछ समस्या है. अनीस आम बच्चों की तरह घुटनों नहीं चल पाता था. कई वर्ष डॉक्टरों का इलाज चला. वर्ष 1999 में डॉक्टरों ने बताया कि अनीस को पूरे जीवन भर वेंटिलेटर के सहारे की ज़रूरत पड़ेगी.

उनके पिता अज़ीज फ़ारूकी बताते हैं,''पहले उसे सोते वक्त करीब आठ घंटे ही वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ती थी क्योंकि उस वक्त उसके फ़ेफ़ड़े काम करना बंद कर देते थे. लेकिन पिछले तीन वर्षों में उसकी हालत ख़राब हो गई है और उसे दिन में 16 घंटे तक मशीन के साथ बिस्तर पर लेटकर बिताने पड़ते हैं. वो अब ज़्यादा देर तक खड़ा नहीं रह पाता. उसे सहारे की ज़रूरत पड़ती है.''

लेकिन अगर आप सोच रहे होंगे कि इन सबसे अनीस उदास है या फिर जीवन के प्रति निराश है तो आप बिल्कुल गलत हैं. अनीस के सामने दीवार पर एक बड़ा सा कंप्यूटर स्क्रीन लगा हुआ है और वायरलेस माउस उसके हाथ में रहता है. बगल में दो मोबाइल फ़ोन रखे रहते हैं.

खाली समय में या तो वो फ़िल्में डाउनलोड करता है, या तो फिर दोस्तों औऱ रिश्तेदारों से मोबाइल फ़ोन पर बातें कर लेता है. और वक्त बचा तो कार्टून फ़िल्में तो हैं हीं. अनीस की ख्वाइश है कि वो एनिमेशन का कोर्स करे और मशहूर कार डिज़ाइनर दिलीप छाबड़िया की तरह कार डिज़ाइनर बने. इसलिए रोल्स-रॉयस के फ़ैन अनीस ने अभी से गाडियों से जुड़ी किताबें पढ़नी शुरू कर दी हैं.

पास्ता, पाव-भाजी, चाट, पानी-पूरी के शौकीन अनीस का कहना है कि खुद को हतोत्साहित होने से रोकने के लिए सबसे आसान है कि व्यक्ति जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर ले और उसी राह पर चले. लेकिन किसी भी परिवार के लिए अपने बच्चे को इस हालात में देखना आसान बात नहीं. अनीस की माँ क़मर उसकी हालत बयान करते-करते रो पड़ती हैं.

वो कहती हैं,''हम बस उसके लिए अल्लाह से दुआ करते हैं. हम उसके लिए नमाज़ पढ़ते हैं. रात में आँख खुलती है तो भी हम उसके लिए दुआ करते हैं कि इस बच्चे को तू अच्छा कर दे. ये बहुत होनहार है, बहुत हिम्मतवाला है. हम खुद बीमार होते हैं तो फिर हम उसको देखते हैं तो एहसास होता है कि हमें कुछ भी नहीं है. इतनी तकलीफ़ होने के बावजूद ये बच्चा इतने सब्र से जीता है.''

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