भाजपा की कमान हथियाने की जुगत में नरेंद्र मोदी
पटना। लगता है गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा के सियासी हालात भांप कर पार्टी पर अपना सिक्का जमाने की घड़ी निकाल ली है। कम से कम उनकी हालिया गतिविधियों को देख कर तो यही लगता है कि मोदी खुद को पार्टी का औपचारिक नेता घोषित करने की कोशिश में जुट गए हैं। इसके लिए उन्होंने पटना में शनिवार से आरंभ भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति को टारगेट किया है। होर्डिंगों, बैनरों व पोस्टरों में छाए रहने के बाद मोदी अब विज्ञापनों के जरिए बिहार के अखबारों में छाए हुए हैं।
कार्यसमिति की बैठक के पहले दिन यानी शनिवार को पटना से प्रकाशित होने वाले लगभग सभी अखबारों में एक पूरे पृष्ठ का विज्ञापन छपा है, जिसमें लिखा है कि गुजरात और बिहार का बहुत पुराना संबंध रहा है। गुजरात में रह रहे बिहार के लोगों की ओर से जारी इस विज्ञापन के जरिए वह खुद को बिहार की जनता के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इस विज्ञापन के जरिए मोदी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विकास मॉडल को चुनौती देते दिख रहे हैं। विज्ञापन में कहा गया है, "संकट की घड़ी में गुजरात हमेशा बिहार के साथ खड़ा रहा है। कोसी नदी में 2008 में आई बाढ़ के दौरान भी गुजरात ने बिहार को सर्वाधिक मदद दी।"
विज्ञापन में यह भी कहा गया है, "विभिन्न धर्म, जाति व सामाजिक तबके का होने के बावजूद गुजरात में लोग शांति व समृद्घि के साथ रह रहे हैं।" पिछले गुरुवार को भी प्रदेश के अखबारों में एक विज्ञापन छपा था जिसमें गुजरात के मुसलमानों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति दर्शाई गई थी और बताने की कोशिश की गई थी कि गुजरात के मुसलमान देश में सर्वाधिक समृद्घ हैं।
दरअसल नरेंद्र मोदी अब खुद को अटल-आडवाणी के बाद भाजपा का सबसे दमदार चेहरा घोषित कराने की कवायद में जुट गए हैं। हाल ही में संपन्न राज्यसभा चुनावों में भी इसकी बानगी देखने को मिली। पार्टी द्वारा राज्यसभा के लिए घोषित उम्मीदवारों में बाजी उनके हाथ लगी जिन पर मोदी का हाथ रहा। मसलन राम जेठमलानी, तरुण विजय, अनिल दवे। संगठन से जुडे अहम फैसलों पर भी मोदी की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। बहरहाल, मोदी की इस राह में संघ एक बडा रोड़ा है लेकिन मोदी समर्थक संघ को यह समझाने में जुटे हैं कि उसे मोदी के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।












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