बाल मजदूरों के लिए कुछ नहीं बदला : बाल श्रम विरोधी दिवस

नई दिल्ली। शनिवार को विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस के रूप में मनाया गया लेकिन राजधानी की सड़कों, होटलों और घरों में मजदूरी कर रहे कुछ बच्चों के लिए इस दिन का कोई खास अर्थ नहीं है। स्वयंसेवी संगठनों द्वारा बाल श्रम का लाख विरोध किए जाने के बावजूद इससे संबंधित कानूनों के लागू नहीं हो पाने से बाल श्रमिकों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आ रहा है।

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आठ साल का सनी दक्षिण दिल्ली में एक चाय की दुकान पर काम करता है, ग्राहकों को चाय देने के अलावा बर्तन धोता है, शनि ने कहा, "मुझे नहीं पता कि बाल श्रम दिवस का क्या मतलब है, हां मैं स्कूल जाना चाहता हूं लेकिन मेरे पिता बीमार हैं इसलिए काम पर नहीं जा सकते। इसलिए मुझे यहां काम करना पड़ता है।"

मोती बाग के चौराहे पर फूल बेचने वाली दुर्गा ने कहा कि उसे अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए यह काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।उसने कहा, "मुझे नहीं पता कि काम करने वाले बच्चों के लिए कोई कानून है, मेरे साथ 14 साल से कम उम्र के पांच बच्चे और हैं, हम सब साथ ही काम करते हैं अगर हम काम नहीं करें तो हमें भूखे रहना पड़ेगा।"

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दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से दुकानों, होटलों पर काम करने के लिए आते हैं।बच्चों को होटलों और घरेलू मदद के कार्यो में लगाने से रोकने के लिए बाल श्रम (रोकथाम एवं नियंत्रण) कानून वर्ष 2006 में लागू किया गया था। सरकारी अनुमान के मुताबिक करीब 1 करोड़ 26 लाख बच्चे देश में मजदूरी कर रहे हैं हालांकि स्वयंसेवी संगठनों के आंकलन के मुताबिक इनकी संख्या 6 करोड़ है।

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