'नेपाली माओवादियों का अंत चाहता था भारत'
चिरन शमशेर थापा नरेश बिरेंद्र के प्रेस सचिव थे। उल्लेखनीय है कि एक जून, 2001 को बिरेंद्र सहित राजशाही परिवार के कुल 10 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस नरसंहार को लेकर पहले राजकुमार दीपेंद्र को जिम्मेदार बताया गया था लेकिन बाद में कई तरह के दावे किए गए।
साप्ताहिक 'नेपाल' से बातचीत में थापा ने कहा कि वर्ष 1990 के दशक में नरेश बिरेंद्र और माओवादियों के बीच सहमति बनती दिखी थी। माओवादी नरेश को संवैधानिक पद दिए जाने पर सहमत थे लेकिन उनकी शर्त थी। माओवादी चाहते थे कि सरकार में नरेश का दखल बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। उस समय नरेश ने इस पर सहमति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जनमत संग्रह कराने का फैसला किया था।
थापा ने कहा कि नरेश बिरेंद्र की हत्या और उनके भाई ज्ञानेंद्र के सिंहासन संभालने के बाद माओवादी छापामारों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई आरंभ करने की बात उठी। इस दौरान माओवादियों के संदर्भ में नेपाल के दो ताकतवर पड़ोसी देशों भारत और चीन का सुझाव अलग-अलग था।
दिवंगत नरेश के इस खास सहयोगी के मुताबिक उस वक्त चीन का सुझाव सभी पक्षों की सहमित लेकर ही कोई कदम उठाने का था जबकि भारत ने इसके बिल्कुल उलट सुझाव दिया। भारत ने उस समय कहा कि माओवादी आतंकवादी हैं और इन्हें खत्म किया जाना चाहिए।
थापा का दावा है कि भारत की रुचि उस समय नेपाल में इस कदर बढ़ गई थी उसने माओवादियों से लड़ने के लिए सेना और पुलिस बल को सीधे तौर पर हथियार मुहैया कराए। उनका दावा है कि वर्ष 2008 के आम चुनावों के दौरान भी माओवादियों को मात देने के लिए भारत सरकार ने नेपाली कांग्रेस का समर्थन किया था।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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