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बायोमेट्रिक तकनीक से ज़िंदगी आसान

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    बायोमेट्रिक तकनीक से ज़िंदगी आसान
    देश की आधी से ज़्यादा जनसंख्या गाँव में रहती है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग अभी भी सरकारी योजनाओं के सभी फ़ायदों से वंचित हैं. बायोमेट्रिक तकनीक के माध्यम से कोशिश हो रही है गाँवों और दुर्गम इलाकों में रहने वालों तक भ्रष्टाचार-रहित फ़ायदा पहुँचाने की.

    हिमाचल प्रदेश के चंबा ज़िले के कीड़ी गाँव में मेरी मुलाकात चंपा देवी से हुई. ऊँचे पहाड़ों में बसे छोटे से गाँव में वो अपने परिवार और दो बच्चों के साथ रहती हैं. वो पिछले दो सालों से नरेगा से जुड़ी हैं. नरेगा के अंतर्गत अपना पैसा लेने के लिए उन्हें कम से कम 12 किलोमीटर चलना पड़ता था.

    पहाड़ों पर टेढ़े-मेढ़े रास्तों से चलकर बैंक पहुँचने में उन्हें दो से ढ़ाई घंटे लग जाते थे. और बैंक पहुँचने पर भी कोई गारंटी नहीं कि पैसा मिल जाए क्योंकि वहाँ बहुत भीड़ रहती थी. लेकिन अब देश के कई दूसरे हिस्सों की तरह उनके गाँव में भी लोगों को बायोमेट्रिक कार्ड दिए गए हैं.

    उन्हें अपने पैसे लेने के लिए दूर बैंक में नहीं जाना पड़ता, बल्कि गाँव के एक व्यक्ति के पास जाना होता है, और बायोमेट्रिक कार्ड के माध्यम से अपनी पहचान साबित करने के बाद उन्हें पैसे मिल जाते हैं. गाँव के इस व्यक्ति को कस्टमर सर्विस प्वाइंट (सीएसपी) कहते हैं.

    चंबा के कीड़ी गाँव में मदन यही काम करते हैं. वो इसी गाँव के ही हैं. गाँव के ज़्यादातर लोग उन्हें जानते हैं और उन पर विश्वास करते हैं. मदन ने हमें बताया कि शुरुआत में जब उन्होंने लोगों को बायोमेट्रिक कार्ड के फ़ायदों के बारे में बताया तो लोगों ने उन पर विश्वास नहीं किया. लोगों को समझाने में उन्हें थोड़ा वक्त लगा.

    आसान प्रक्रिया

    पैसे पाने की पूरी प्रक्रिया बेहद आसान है. इसमें होता है एक मोबाईल फ़ोन और फिंगरप्रिंटिंग मशीन जो उंगलियों के निशान पढ़ सकती है. साथ में होता है बायोमेट्रिक कार्ड. यानि एक ऐसा कार्ड जिसमें नरेगा में काम करने वाले व्यक्ति का नाम, पता, उनकी उंगलियों के निशान के अलावा कई जानकारियों मौजूद होती हैं.

    नरेगा के अंतर्गत आपके जितने पैसे बनते हैं, उसे लेने के लिए आप गाँव के एक व्यक्ति के पास बायोमेट्रिक कार्ड लेकर जाइए, उंगली के निशान सत्यापित करिए और अपने पैसे ले लीजिए. बायोमेट्रिक कार्ड में दर्ज जानकारी जाती है मोबाईल फ़ोन में, फ़ोन से कंपनी के पास और फिर बैंक के पास. ये काम मिनटों में होता है और अकांउटधारक का अकाउंट मिनटों में अपडेट हो जाता है.

    सीएसपी काम करते हैं ऐसी कंपनियों के लिए जिनका मक़सद मुनाफ़ा कमाना नहीं होता. ज़ीरो फ़ाउंडेशन और फ़ीनो ऐसी ही कंपनियाँ हैं. ये कंपनियाँ काम करती हैं बैंको के लिए जहाँ अकाउंटधारक का अकाउंट होता है. देश के दूसरे प्रदेशों जैसे आंध्र प्रदेश और राजस्थान में लोगों को बायोमेट्रिक कार्ड के माध्यम से पैसे मिलने शुरू हो गए हैं.

    पेंशन

    बायोमेट्रिक कार्ड का इस्तेमाल नरेगा के अलावा लोगों को पेशन बांटने जैसे कामों में भी किया जा रहा है. हिमाचल का उना ज़िला इन्हीं में से एक है. हम पहुँचे उना ज़िले के संतोकगढ़ इलाके में जहाँ कई बूढ़े लोगों को पेशन मिल रहा है. ज़ीरो फ़ाउंडेशन के करतार चंद ने हमें बताया कि सबसे पहले उन्हें सरकार की तरफ़ से पेंशन पाने वाले लोगों की सूची मिली. उस सूची को लेकर जब वो लोगों के घर गए तो पता चला कि कई गलत लोगों को भी पेंशन मिलती थी.

    इलाके में घूमते वक्त हमें बचनी देवी मिलीं. उन्होंने हमें बताया कि अब उन्हें अपनी पेंशन के लिए पोस्ट ऑफ़स के डाकिए पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, बल्कि उनके घर से थोड़ी ही दूर स्थित सीएसपी बलराम कुमार से उन्हें अपने पैसे मिल जाते हैं. बलराम कुमार के पास भी एक फ़िंगरप्रिंटिंग मशीन के अलावा एक मोबाईल फ़ोन है. बचनी देवी को पेंशन लेने के लिए सिर्फ़ बायोमेट्रिक कार्ड की ज़रूरत होती है जिसे प्रस्तुत करने के बाद उन्हें पेंशन के पैसे मिल जाते हैं.

    लेकिन बलराम कुमार की शिकायत है कि कई बार जब पेंशन देने के लिए सीमावर्ती इलाकों में जाते हैं तो खराब नेटवर्क की वजह से उन्हें बहुत परेशान होना पड़ता है. वो कम मेहनताने की भी शिकायत करते हैं. “अभी मुझे सारे लेनदेन का आधा प्रतिशत मिलता है जो कि बेहद कम है. इसे बढ़ाना जाना चाहिए."

    बैंक अधिकारी भी यही मानते हैं. उन्हें पता है कि इस पूरे काम का मुख्य भार सीएसपी पर है और वो बैंक का प्रतिनिधित्व करते है.

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