खतरे में हैं बिहार की डॉल्फिन

केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2009 में लागू की गई 'भारतीय वन्य जीव संरक्षण नीति' के तहत भी बिहार की गंगा नदी में स्तनधारी जल जीव डॉल्फिन की सुरक्षा के लिए कोई खास प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।

विशेषज्ञ कहते हैं कि जिस तरह बाघ जंगल की सेहत का प्रतीक हैं उसी तरह डॉल्फिन गंगा नदी के स्वास्थ्य की निशानी हैं। आंकड़ों के मुताबिक एक वर्ष पूर्व पटना में गंगा नदी के गाय घाट से लेकर कलेक्ट्रियट घाट तक 200 डॉल्फिन थीं परंतु इसकी संख्या अब 25 से 30 ही रह गई है।

उल्लेखनीय है कि इन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार ने वर्ष 1991 में बिहार के सुल्तानगंज से लेकर कहलगांव तक के करीब 60 किलोमीटर क्षेत्र को 'गैंगेटिक रिवर डॉल्फिन संरक्षित क्षेत्र' घोषित किया था। इसके बाद भी डॉल्फिन के शिकार में कमी नहीं आ रही है।

पिछले एक महीने के अंदर पटना सहित पूरे बिहार में पांच डॉल्फिनों को गंगा के तट पर मृत पाया गया। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक सभी मृत डॉल्फिनों का शिकार किया गया था।

भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही डॉल्फिन कार्य योजना के अध्यक्ष आऱ क़े सिंह बताते हैं कि डॉल्फिनों में एक विशेष प्रकार का तेल पाया जाता है। यह तेल किसी भी डॉल्फिन के वजन के 30 प्रतिशत के बराबर होता है। इस तेल की गंध से अन्य मछलियां उसकी ओर आकर्षित होती है। मछुआरे अपने जाल में इसी तेल का प्रयोग करते हैं इस कारण वे डॉल्फिन का शिकार करते हैं।

सिंह बताते हैं कि अब भारत में 2000 से कम ही डॉल्फिन हैं। वह डॉल्फिनों की संख्या में आई कमी के लिए गंगा नदी के प्रदूषण को जिम्मेदार मानते हैं।

इधर, पटना के वन प्रमंडल पदाधिकारी सुरेन्द्र सिंह ने मंगलवार को बताया कि संसाधनों के अभाव में डॉल्फिन बचाव अभियान प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि डॉल्फिन के बचाव के लिए गंगा में गश्ती अभियान चलाया जा रहा है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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