'जातिगत संघर्ष पर होगा महिला आरक्षण विधेयक का असर'
कानूनी सशक्तीकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के सलाहकार बिभु महापात्रा कहते हैं, "1992 में पारित हुए 73वें संवैधानिक संशोधन से स्थानीय स्व शासन को संवैधानिक मान्यता मिली थी और पंचायतों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित हुई थीं। इससे लाखों महिलाओं को अधिक अवसर देकर उन्हें सार्वजनिक जीवन में प्रवेश का प्रोत्साहन मिला था।"
महापात्रा ने आईएएनएस से कहा, "महिला आरक्षण विधेयक का भी यही प्रभाव होगा। जातिगत संघर्ष पर भी इसका असर होगा। आज सवाल उठ रहे हैं कि दलित समुदाय में कौन अधिक हाशिए पर है और ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि राजनीति में अधिक महिलाएं आगे आ रही हैं।"
यह विधेयक हंगामे के बाद मंगलवार को राज्यसभा में पारित हो गया है। लोकसभा में पिछले तीन दिन से इस विधेयक का विरोध हो रहा है लेकिन उम्मीद की जा रही है कि 16 मार्च को संसद का यह सत्र समाप्त होने से पहले यहां भी यह विधेयक पारित हो जाएगा।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में समाजशास्त्री कमल मित्रा शिनॉय ने कहा, "शुरुआत में इसका जातिगत संघर्ष पर ज्यादा असर नहीं होगा क्योंकि जो प्रभावी लोग हैं वे अपने उम्मीदवारों को राजनीति में उतारेंगे।"
उन्होंने कहा, "लेकिन समय के साथ निश्चित तौर पर महिलाएं सशक्त होंगी क्योंकि इस विधेयक का पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर असर पड़ेगा और लिंग अवधारणा बदलेगी। राजनेता अपनी पत्नियों और बेटियों को ही राजनीति के मैदान में नहीं उतार सकेंगे।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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