महाराष्ट्र में टैक्सी परमिट नियमों पर विवाद

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महाराष्ट्र के मंत्रिमंडल ने बुधवार को फ़ैसला किया है कि टैक्सी चालकों के लिए राज्य में 15 साल के निवास के साथ-साथ मराठी बोलना, पढ़ना और लिखना अनिवार्य होगा. नए टैक्सी चालकों को परमिट तभी मिलेगा यदि वे इन शर्तों को पूरा करते हैं.

हालाँकि पुराने परमिट रद्द नहीं किए जाएँगे लेकिन इस फ़ैसले के बाद जहाँ टैक्सी चालकों में खलबली मच गई है वहीं उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती के मुखर विरोध के कारण, इस फ़ैसले पर नया विवाद ख़ड़ा हो गया है.

बीबीसी के लखनऊ संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी के अनुसार मायावती ने एक बयान में कहा है, "ये पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित फ़ैसला है. ये लोकतांत्रिक कायदे और भारतीय संविधान की आत्मा के ख़िलाफ़ है. हमारी पार्टी इस फ़ैसले का कड़ा विरोध करती है."

मुंबई शहर में अनेक टैक्सी चालक उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड या झारखंड से हैं और इनमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने इस फ़ैसले का विरोध किया है. सरकार के फ़ैसले के मुताबिक नए परमिट के लिए न केवल लोगों को राज्य में 15 साल के अपने निवास का प्रमाण देना होगा बल्कि मराठी की जानकारी भी साबित करनी होगी. मुंबई के लगभग 90 हज़ार टैक्सी चालकों में से अधिकतर मराठी इसलिए नहीं जानते हैं क्योंकि वे मूलत: उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों से आए हैं.

वर्ष 1993 से मुंबई में टैक्सी चला रहे राज बहादुर प्रजापति मुंबई टैक्सी यूनियन के सदस्य हैं. उनका कहना है, "परमिट योग्यता के आधार पर दिए जाने चाहिए न मराठी या गुजराती भाषा जानने के आधार पर. हमें तो परमिट योग्यता के आधार पर ही मिला था." उन्होंने ज़ोर देकर कहा, "अगर ऐसा हो रहा है तो ये ग़लत है. यूनियन में हम यह बात रखेंगे की परमिट योग्यता पर दिया जाना चाहिए न कि सरकार के नए फ़ैसले के आधार पर."

उत्तर भारत मुंबई में टैक्सी चलाने पहुँचे मुज़फ़्फ़र अंसारी भी सरकार के नए फ़ैसले का कड़ा विरोध करते हैं. "अगर कोई नागरिक टैक्सी लेना चाहता है और 15 साल से यहाँ रह भी रहा है, तब भी मराठी जानने या न जानने के आधार पर उसे परमिट न दिया जाना सही नहीं है."

अब्दुल शफ़ीक़ 15 साल से मुंबई में टैक्सी चला रहे हैं लेकिन उन्हें भी ये फ़ैसला आश्चर्यजनक लगा है. वे कहते हैं, "जो मराठी नहीं जानते, क्या उन्हें रोटी कमाने का कोई हक़ नहीं है?" महाराष्ट्र में हर साल 4000 नए परमिट जारी किए जाते हैं और इन्हें पाने वालों में अधिकतर उत्तर भारत से आने वाले होते हैं

राजनीतिक विश्लेषक और स्थानीय मीडिया इस फैसले को राजनीति मजबूरी से प्रेरित मानते हैं. उनका मानना है कि कांग्रेस सरकार ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिवसेना के समर्थकों को लुभाने के मक़सद से ये कदम उठाया है. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे पिछले कुछ साल से राज्य में हिंदी भाषियों के खिलाफ़ आंदोलन चला रहे हैं. इसके कारण दुकानों और दफ़्तरों के बाहर भी नाम मराठी में लिखे जाने लगे हैं.

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