मानवीय एहसासों को उकेरती कहानियां (पुस्तक समीक्षा, फोटो सहित)

अंजना शर्मा

नई दिल्ली, 20 जनवरी (आईएएनएस)। कथाकार राजेंद्र अवस्थी की कहानियां मानव मन के कोमल और कठोर भावों को बहुत ही खूबसूरती के साथ उकेरने में सफल रही हैं। यूं तो उनकी कहानियां कहानी की कोई नई जमीन नहीं गढ़ती हैं लेकिन फिर भी कुछ कहानियां ऐसी हैं जो पाठक को अंदर तक झकझोर कर रख देती हैं।

कहानियां पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक को अपनी कहानियों में सुंदर शब्द बुनने के लिए कुछ खास प्रयास नहीं करना पड़ा है बल्कि कहानी इन शब्दों में खुद-ब-खुद सहजता से उतर आई है।

लेखन ने मध्यम वर्ग के सामान्य लोगों के जीवन की साधारण सी घटनाओं को विशिष्टता के साथ उभारा है। लगभग एक जैसी ही पृष्ठभूमि में रची ये कहानियां एक-दूसरे से समानता रखते हुए भी बहुत भिन्न हैं।

संग्रह की पहली कहानी 'पीढ़ियां' पाठकों के समक्ष एक ऐसे अकेलेपन के शिकार व्यक्ति को प्रस्तुत करती है जिसके विचार और भावनाएं बहुत तेजी से बदलते हैं। अपने ही विचारों में खोए रहने वाले इस कहानी के नायक सुरजीत सिंह अपनी बेटी जसवीर से बेहद प्यार करते हैं। उन्हें अपनी बेटी पर बहुत भरोसा है लेकिन कभी-कभी अविश्वास की छाया उन्हें घेर लेती है। कहानी के अंत में सुरजीत सिंह का भरोसा टूटता है लेकिन तब भी वह अपनी बेटी को उसकी गलतियों के साथ स्वीकार कर लेते हैं।

'जनसेवा' शीर्षक कहानी में राजनेताओं और उनकी जनसेवा की भावना पर तीखा कटाक्ष किया गया है। कहानी में इन जनसेवकों की जन भावना से प्रभावित आम लोगों के चरित्रों को मार्मिकता के साथ उकेरा गया है।

एक अन्य कहानी 'भूचाल' आज की भाग-दौड़ की जिंदगी में अपनी जीविका कमाने की जद्दोजहद में फंसे एक आदमी के मन में उठते कोमल भावों का चित्र खींचती है लेकिन ये भाव जहां से उठते हैं वहीं पर बिना प्रकट हुए ही दोबारा खो जाते हैं।

'दो जोड़ी आंखें' कहानी एक स्त्री के मन के भीतर चल रहे द्वंद्व को प्रकट करती है। जबकि 'औरत एक मक्खी' कहानी में स्त्री की दयनीय स्थिति प्रस्तुत की गई है।

कहानी 'खुली खिड़की' में दहेज प्रथा की शिकार बनी लड़की के प्रति नायक के मन में कोमल भावनाएं उपजती हैं लेकिन ये भावनाएं जहां उपजती हैं वहीं समाप्त भी हो जाती हैं। यथार्थ जीवन में भी अक्सर ऐसा ही होता है। 'दो चोटी: दो रिबन' एक हल्की-फुल्की लेकिन सुंदर कहानी है।

संग्रह की कुछ कहानियां ग्रामीण परिवेश का चित्र खींचती हैं तो कुछ शहरी परिवेश को उभारती हैं। उनकी कहानियों में एक ओर जहां उदासी, विछोह और अकेलापन है तो दूसरी ओर खुशी और अल्हड़पन भी है।

लेखक ने ज्यादातर कहानियों में संकेतों में बात कही है। कहीं-कहीं ये संकेत सहज सम्प्रेषित होते हैं तो कहीं-कहीं ये इतने जटिल हो जाते हैं कि पाठक इन संकेतों और कहानी के मूल में कोई संबंध ही स्थापित नहीं कर पता है। उनकी कहानी 'अंगुलियां' संकेतों से शुरू होती है लेकिन इन संकेतों और आगे की कहानी में संबंध स्थापित करना थोड़ा मुश्किल होता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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