ज्योति बसु: वामपंथ के इस पुरोधा का सफरनामा कुछ यूं रहा

उन्होंने 2000 में ही सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था लेकिन इसके बावजूद वह भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के पथप्रदर्शक बने रहे।

उनके जीवन से जुड़ी कुछ प्रमुख घटनाएं :-

- 8 जुलाई 1914 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में जन्म।

-प्रेसिडेंसी कॉलेज से अंग्रेजी विषय में प्रतिष्ठा के साथ स्नातक की डिग्री। लंदन से कानून की पढ़ाई की। वहीं मार्क्‍सवाद का 'ककहरा' सीखा और सार्वजनिक जीवन से जुड़े।

- 1940 में भारत वापसी के साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) से जुड़ गए।

- 1944 में वह बंगाल रेलवे कामगार संघ के पदाधिकारी बने।

- 1946 में बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए। उन्होंने कांग्रेस के हुमायूं कबीर को पराजित किया।

- इसके बाद 1952, 1957, 1962, 1967, 1969 और 1971 में वह बड़ानगर विधानसभा से चुने जाते रहे। इस दौरान वह 1972 में विधानसभा चुनाव भी हारे।

- वर्ष 1964 में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की स्थापना हुई। वह इसके संस्थापकों में रहे।

- वर्ष 1967 में वह बंगाल की गठबंधन सरकार में उपमुख्यमंत्री बने।

- 21 जून 1977 को वह पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने। वह छह नवम्बर 2000 तक पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चे की सरकार के मुखिया बने रहे।

- 1996 में वह देश के प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए। उनकी पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था का फैसला उनके प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में आड़े आया। बाद में ज्योति बाबू ने पार्टी के इस फैसले को ऐतिहासिक गलती करार दिया।

- वर्ष 2000 में उन्होंने बिगड़ते स्वाथ्य के कारण मुख्यमंत्री का पद छोड़ा और फिर सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा की।

- वर्ष 2004 में केंद्र में कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार को वामपंथी दलों की ओर से दिए गए समर्थन में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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