वित्त मंत्री ने की राज्यों के वित्त मंत्रियों के साथ बजट पूर्व बैठक
मुखर्जी ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि यह बैठक एक असाधारण अभ्यास है और वित्त मंत्री को आम बजट तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध कराती है।
मुखर्जी ने कहा कि आर्थिक पुनर्जीवन आवश्यक रूप से केन्द्र और राज्य सरकारों का सहयोगात्मकप्रयास है। उन्होंने कहा कि जुलाई, 2009 में जब वर्ष 2009-10 का बजट पेश किया गया था भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व के वित्तीय संकट के विपरीत प्रभाव के कारण अत्यधिक कठिन दौर से गुजर रही थी। अर्थव्यवस्था में मंदी और इस संकट की प्रतिक्रिया स्वरूप सरकार की नीति के हिस्से के तौर पर करों में दी गई रियायतों के कारण सरकार के राजस्व में गिरावट आ गई थी।
उन्होंने कहा कि सरकार ने अनेक बाधाओं के बावजूद अंतरिम बजट के अलावा चालू वर्ष की वार्षिक योजना के लिए 40,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि आवंटित की थी। यह अतिरिक्त राशि मुख्यतया भारत निर्माण की योजनाओं जैसे पीएमजीएसवाई और आईएवाई तथा अन्य महवपूर्ण योजनाओं जैसे एनआरइजीएस, एनआरएचएस और जेएनएनयूआरएम आदि के लिए थी। यह पिछली बजट पूर्व बैठक में राज्यों के वित्त मंत्रियों द्वारा ग्रामीण मूलभूत योजनाओं के लिए बढ़ा हुआ आबंटन करने के सुझावों के अनुरूप था।
उन्होंने कहा कि राज्यों को अपने वार्षिक योजना बजटों के लक्ष्य प्राप्त करने में सक्षम बनाने के लिए वित्तीय घाटे की सीमा को बढ़ा कर राज्यों के जीएसडीपी का 4 प्रतिशत किया गया। यह रियायत राज्यों को 21,000 करोड़ रुपये तक अतिरिक्त ऋण लेने के लिए दी गई थी। वित्त मंत्री ने कहा कि यह भी पिछली बजट पूर्व बैठक में रखे गए सुझावों के अनुरूप था।
चावल, गेहूं, दालों और सब्जियों आदि सहित खाद्य कीमतों में वृद्घि पर चिंता व्यक्त करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि ये आम आदमी और उसके बजट पर तीखा प्रभाव डाल रही है। उन्होंने कहा कि चीनी के मूल्य में वृद्घि इसकी मांग में वृद्घि के कारण हो सकती है। लेकिन चावल, गेहूं, दालों, सब्जियों आदि की कीमतों में वृद्घि मुख्यत: आपूर्ति में कमी के कारण हो सकती है जिसे लघु, मध्यम और दीर्घकालीन स्तर पर सामूहिक रूप से हल करने की आवश्यकता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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