प्रधान न्यायाधीश का पद आरटीआई के दायरे में, फैसले का व्यापक स्वागत (राउंडअप)

उच्च न्यायालय के इस फैसले का देशभर के आरटीआई कार्यकर्ताओं और न्यायिक महकमे ने स्वागत किया है। इन सभी ने कहा है कि इस फैसले से न्यायपालिका अधिक जवाबदेह और पारदर्शी होगी।

मुख्य न्यायाधीश अजित प्रकाश शाह, न्यायमूर्ति एस.मुरलीधर तथा न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन की खंडपीठ ने कहा, "न्यायपालिका की जवाबदेही को अलग से नहीं देखा जा सकता। इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें शासक जनता के प्रति पारदर्शी, सुलभ और प्रभावी तरीके से जवाब देने के लिए जवाबदेह होते हैं। लोकतंत्र खुलेपन की मांग करता है और खुलापन मुक्त समाज का सहवर्ती है। धूप सर्वोत्तम संक्रमण रोधी है।"

खण्डपीठ ने कहा, "अधीनस्थ न्यायपालिका पहले ही अपनी संपत्तियों की घोषणा कर रही है। इसलिए जब वे जवाबदेह हैं तो हम भी जवाबदेह हैं। इस प्रकार न्यायपालिका में जो जितना बड़ा है, जनता के प्रति उसकी जवाबदेही उतनी ही बड़ी है।"

फैसला सुनाते समय न्यायाधीशों ने आश्वस्त किया कि वे भी अगले सप्ताह अपनी संपत्तियों की घोषणा करेंगे।

खण्डपीठ ने अपने 88 पृष्ठों के फैसले में कहा, "सूचना एक ऐसी मुद्रा है, जिसकी जरूरत सामाजिक शासन और जीवन में हर नागरिक को होती है।"

आरटीआई के महत्व पर जोर देते हुए खंडपीठ ने कहा कि आरटीआई का प्रभाव बहुत अधिक है। ऐसी जानकारी चाहने वाले नागरिकों को इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए, इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता बची रहेगी।

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा, "आयकर विवरणी और चिकित्सा दस्तावेजों का खुलासा आरटीआई के तहत नहीं किया जाएगा लेकिन यदि इससे जनहित जुड़ा हो तब इसका भी खुलासा किए जाने की आवश्यकता होगी।"

वर्ष 1997 और 1999 में दो प्रस्तावों में कहा गया है कि न्यायाधीशों के लिए संपत्तियों की घोषणा बाध्यकारी नहीं वरन ऐच्छिक हो सकती है। इस संबंध में न्यायालय ने कहा, "प्रस्ताव को न्यायाधीशों की जवाबदेही के लिए बनाया गया है और हमें समान रूप से इसका पालन करना चाहिए।"

आरटीआई के महत्व को रेखांकित करते हुए खंडपीठ ने कहा, "आरटीआई का व्यापक प्रभाव है। इस तरह की सूचनाएं हासिल करने वाले नागरिकों को सूचना का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।"

खण्डपीठ ने इस मामले पर नवंबर 2009 में अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था।

सर्वोच्च न्यायालय रजिस्ट्री की ओर से उपस्थित महान्यायवादी ई.वाहनवती ने तर्क दिया कि न्यायाधीशों की संपत्ति की घोषणा संबंधी प्रस्ताव गैर संवैधानिक, गैर बाध्यकारी है और यह किसी न्यायाधीश को देश के प्रधान न्यायाधीश के समक्ष अपनी संपत्ति घोषित करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने दो सितम्बर 2009 को इस विवादास्पद मुद्दे पर अपने फैसले में कहा था कि प्रधान न्यायाधीश का पद एक सार्वजनिक अधिकरण है और उसका पद भी पारदर्शिता के लिए बने कानून के दायरे में आता है।

यह फैसला प्रधान न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन के रुख के विपरीत है। बालाकृष्णन लगातार कहते रहे हैं कि उनका पद आरटीआई कानून के दायरे से बाहर है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले की पूरे देश के आरटीआई कार्यकर्ताओं ने प्रशंसा की है।

आरटीआई कार्यकर्ता सुभाषचंद्र अग्रवाल ने आईएएनएस से कहा, "इस निर्णय के महत्व को व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। मैं केवल यह कह सकता हूं कि यह एक ऐतिहासिक फैसला है। यह निर्णय देश में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाने में पथप्रदर्शक का काम करेगा।"

अग्रवाल की ही याचिका पर केंद्रीय सूचना आयोग ने फैसला दिया था कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश का पद सार्वजनिक अधिकरण है।

अग्रवाल का मुकदमा लड़ने वाले सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने आईएएनएस से कहा, "यह एक ऐतिहासिक फैसला है और न्यायपालिका भी जवाबदेह है तथा इसके कार्यो से जुड़ी सभी सूचनाएं आरटीआई के तहत उपलब्ध होने पर बल देने के लिए इसका दूरगामी प्रभाव होना चाहिए।"

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय सूचना आयोग के फैसले के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील की थी। परंतु उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने दो सितम्बर 2009 के फैसले में प्रधान न्यायाधीश के पद को आरटीआई के दायरे में होने का फैसला कायम रखा था।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को अपनी एकल पीठ के इस फैसले को बरकरार रखा।

कांग्रेस, भाजपा की चुप्पी : दिल्ली उच्च न्यायालय इस फैसले पर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सीधी प्रतिक्रिया देने से बच रही हैं।

अदालत के फैसले के बारे में पूछे जाने पर कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने आईएएनएस से कहा, "यह न्यायपालिका और सूचना के अधिकार के बीच का मामला है। हम इस पर प्रतिक्रिया देना नहीं चाहेंगे।"

उन्होंने हालांकि यह जरूर कहा कि प्रशासन के विभिन्न अंगों में पारदर्शिता होनी चाहिए।

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि इस फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों में जवाबदेही और पारदर्शिता होनी चाहिए।

मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की वरिष्ठ नेता बृंदा करात ने अदालत के इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि फैसले का विस्तृत अध्ययन करने के बाद उनकी पार्टी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देगी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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