'26/11 के दौरान पुलिस के पास आधुनिक उपकरणों का अभाव'
नई दिल्ली, 29 दिसम्बर (आईएएनएस)। वर्ष 2008 के मुंबई हमलों की जांच के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति का कहना है हमले के दौरान पुलिस के पास उपकरणों और रणनीति का अभाव था और इसी वजह से प्रशिक्षित और साधन संपन्न आतंकवादियों का मुकाबला उचित तरीके से नहीं हो सका।
मुंबई हमलों की जांच के लिए गठित आर. डी. प्रधान समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि 26/11 के दौरान मुंबई पुलिस के पास ऐसे हथियार नहीं थे, जिससे आतंकवादियों से मुकाबला किया जा सके। रिपोर्ट के अनुसार आतंकवादी एके-47 राइफल्स, पिस्टल, हथगोले और आरडीएक्स से लैस थे।
आईएएनएस के पास प्रधान समिति की 90 पृष्ठों वाली जांच रिपोर्ट की एक प्रति है, जिसे पूर्व गृह सचिव आर.डी. प्रधान और पूर्व नौकरशाह वी.बालाचंद्रन ने तैयार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हमले के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों के पास तो केवल लाठियां थी।
महाराष्ट्र सरकार ने पिछले हफ्ते इस रिपोर्ट को राज्य विधानसभा में पेश किया था लेकिन इसे अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है, "आतंकवादियों से मुकाबला कर रहे पुलिस वाहनों में लाठियां, गैस छोड़ने वाले उपकरण और .303 राइफल्स थे।"
समिति ने राज्य सरकार और पुलिस की यह कहकर आलोचना की है कि तमाम खुफिया चेतावनियों के बावजूद मुंबई पर हमले को रोका नहीं जा सका। प्रशासन को निशाना बनाते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस बल को हथियार और आवश्यक प्रशिक्षण नहीं दिया गया था।
रिपोर्ट में कहा गया है, "मुंबई पुलिस के पास आतंकवादियों से लड़ने के लिए पर्याप्त मात्रा में बुलेटफ्रूफ जैकेट नहीं थे। जांच में हमने पाया कि पुलिस के पास 1993 की बुलेटफ्रूफ जैकेट थी, जिसका वजन 10 से 12 किलोग्राम था। भारी वजन वाले ऐसे जैकेट के साथ कोई आतंकवादी से कैसे लड़ सकता है? "
आतंकवादियों से मुकाबला करने के लिए गठित त्वरित कार्रवाई दस्ता (क्यूआरटी) के अधिकारियों और जवानों को प्रशिक्षण नहीं दिया गया था। रिपोर्ट में एक विशेषज्ञ के हवाले से कहा गया है, "क्यूआरटी की संगठनात्मक संरचना और प्रशिक्षण कार्यक्रम का भारी अभाव था। "
रिपोर्ट में कहा गया है, "क्यूआरटी के अधिकारी और जवानों ने सितम्बर 2007 से गोलीबारी का अभ्यास नहीं किया था क्योंकि उनके पास गोला-बारुद का अभाव था।"
समिति का कहना है कि लाल फीताशाही की वजह से पुलिस के आधुनिकीकरण की नीति बाधित हुई। इसी कारण पुलिस नए हथियार नहीं खरीद सके।
समय पर हथियारों की खरीद नहीं होने की वजह से कीमतों में भी वृद्धि होती चली गई। वर्ष 2007 में हथियारों की खरीद की राशि का अनुमान 168 करोड़ रुपये लगाया गया था जो 2008 में बढ़कर 210 करोड़ रुपये हो गया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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