सुनामी ने बना दी जिंदगी

इन पांच सालों के दौरान इरूला जनजाति को स्कूलों की अच्छी सुविधा और बेहतर आर्थिक अवसर मिले हैं। नीमीलि गांव में इरूला जनजाति की मोहाना ने कहा, "सुनामी से पहले मैं तट के किनारे एक छोटी सी झोंपड़ी में रहती थी। सुनामी आने पर मेरे पास जो थोड़ा-बहुत था वह भी खो गया।"
वह कहती हैं, "चूंकि हम मछुआरों के समुदाय से नहीं हैं, इसलिए हम इससे सीधे प्रभावित नहीं हुए थे और हमें सरकार से त्वरित मदद नहीं मिली थी। यद्यपि उसके बाद कुछ स्वयंसेवी संगठन मदद के लिए आए और उन्होंने हमें घर बनाने के लिए जमीन दी। इससे हमें बहुत राहत मिली है।"
सांप पकड़कर जीवनयापन
मोहना कहती हैं कि अब वह अपने गांव के स्व-सहायता समूह की प्रमुख भी हैं। पीढ़ियों से जंगलों में सांप पकड़कर जीवनयापन करने वाली इरूला जनजाति के ज्यादातर लोग तमिलनाडु के तटीय इलाकों के करीब बसे हुए हैं।
सामाजिक पदानुक्रम में इस जनजाति को पहले ही सबसे नीचे रखा गया है जबकि 1972 के वन्य जीव संरक्षण कानून ने उनके जीवनयापन के तरीकों को गैरकानूनी करार दे दिया है। सुनामी ने अचानक इस जनजाति की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। यह तूफान अपने साथ इस जनजाति के लिए राहत लाया है।
इस जनजाति की मदद के लिए दो स्वयं सेवी संगठन (एनजीओ) 'एक्शन एड' और 'इरूला ट्रायबल वूमेन्स वेलफेयर सोसायटी' (आईटीडब्ल्यूडब्ल्यूएस) सामने आए।
स्कूल खुले
संगठनों ने जनजाति की महिलाओं को जमीन के टुकड़े देने के साथ उन्हें घर बनाने में मदद की और स्कूल भी खोले। उन्होंने जनजाति के बीच अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाए।
एक्शन एड के मुताबिक 150,000 लोगों की आबादी वाली इरूला जनजाति में केवल चार प्रतिशत लोग ही शिक्षित हैं। आईटीडब्ल्यूडब्ल्यूएस के जैकब प्रेमकुमार के मुताबिक शुरूआत में इरूला जनजाति के अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार नहीं थे लेकिन बाद में जागरूकता कार्यक्रमों के चलते वे इसकी अहमियत समझने लगे।
सुनामी में पूर्वी तट के 12,000 लोगों की मौत हो गई थी और 200,000 से ज्यादा लोगों ने अपना सब कुछ गंवा दिया था लेकिन सुनामी के पांच साल बाद इरूला जनजाति इस आपदा के बाद उनका भाग्य बदलने की खुशियां मना रही है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












Click it and Unblock the Notifications