सन के रेशों से क्रिसमस की खुशियां बुनती हैं महिलाएं

यह गांव सन के रंगीन रेशों से क्रिसमस ट्री व खेल-खिलौने बनाने के लिए जाना जाता है। गांव की महिलाएं सन के रेशों के सहारे कुटीर उद्योग चलाती हैं और इस तरह वे महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनी हुई हैं।

मुजफ्फरनगर-बिजनौर मार्ग पर बसा गांव वलीपुरा महिलाओं की मेहनत के कारण देश भर में पहचान बना रहा है। इसके कारण यह गांव सामाजिक एकता व सद्भाव के सूत्र में भी बंधा हुआ है। यहां महिलाओं द्वारा बनाए गए खेल-खिलौने, क्रिसमस ट्री उत्तर भारत सहित देश के कोने-कोने में जाते हैं।

बगैर किसी शोर शराबे व सरकारी मदद के यहां के ग्रामीणों ने इतना आर्थिक सशक्तिकरण कर लिया है कि वे अब उन्हें दूसरों की मजदूरी नहीं करनी पड़ती है। बड़े-बूढ़े, बच्चे, महिलाएं हर किसी की दिनचर्या में यह कुटीर उद्योग कुछ ही बरसों में गहरी पैठ बना चुका है। इस गांव के हर परिवार में सन की रस्सी को रंगकर उसके रेशों को खोलकर क्रिसमस ट्री तैयार किए जाते हैं।

क्रिसमस ट्री मध्यवर्गीय व गरीब परिवारों के शो-केस में साज-सज्जा का सामान माना जाता है। मिट्टी के मजबूत छोटे स्तम्भ में तार को खड़ा कर उसमें कई प्रकार के रंगों में डूबो कर तैयार किए गए सन के रेशों को फंसाकर यह क्रिसमस ट्री तैयार होता है।

इस गांव में इसके अतिरिक्त सन के रेशों के शो-पीस, पशु-पक्षी, साइकिल के रिम में पड़ने वाले रंग-बिरंगे फूल भी बनाए जाते हैं।

महिलाएं बारीक लोहे के तार में रेशों व लोहे के तार से आकृति बनाने में सुबह से ही जुट जाती है। पुरुष इन तैयार वस्तुओं को पंजाब, हरियाणा, बिहार व उत्तर प्रदेश व देश के अन्य हिस्सों में बेचने के लिए जाते हैं।

यहां महिलाओं की व्यापारिक व आर्थिक मुद्दों पर इतनी समझ है कि अनपढ़ होते हुए भी वे अपने व्यापार और लाभ-हानि का खुद विश्लेषण करती हैं।

शो-पीस व खिलौने के इस कारोबार से जुड़े ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें उनकी मेहतन के हिसाब से कीमत नहीं मिल पाती है। ग्रामीण जब अपने बनाए शो-पीस, क्रिसमस ट्री की तरफ निहारते हैं तो उन्हें यह अहसास तक नहीं होता कि यह शो-पीस क्रिसमस ट्री खुशियों से झोली भरने वाले सांता क्लॉज का है, जो हर क्रिसमस पर खुशियां बांटते हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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