जलवायु परिवर्तन समझौता-एक 'मजबूत संकेत या पाखंड'?

अरुण कुमार

वाशिंगटन, 19 दिसम्बर (आईएएनएस)। भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ अमेरिका के जलवायु परिवर्तन समझौते को जहां राष्ट्रपति बराक ओबामा के समर्थक एक 'मजबूत संकेत' बता रहे हैं वहीं अमेरिका के कुछ पर्यावरण समूहों ने इसे 'पाखंड' करार दिया है।

सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष जॉन एफ.कैरी ने ओबामा और अन्य उभरती अर्थव्यवस्था वाले तीन देशों के नेताओं को जलवायु परिवर्तन के हल में प्रमुख भागीदार बताते हुए कहा कि कोपेनहेगन समझौते ने घरेलू कानून के लिए आधार तैयार किया है।

उन्होंने कहा, "राष्ट्रपति ओबामा, प्रधानमंत्री जियाबाओ, प्रधानमंत्री सिंह और राष्ट्रपति जुमा के सहमत होने का यह एक मजबूत संकेत है। जलवायु परिवर्तन के हल में इन चारों की प्रमुख भूमिका है।"

लेकिन बहुत से गैर सरकारी संगठन इस समझौते से नाखुश हैं। ग्रीनपीस इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक कुमी नायडू ने कहा, "वैश्विक नेता जलवायु परिवर्तन की आपदा को टालने में नाकाम रहे हैं। सभी स्थानों के लोग शिखर बैठक शुरू होने से पहले से ही यहां वास्तविक करार की मांग कर रहे थे। हम अब भी लाखों लोगों को गरमाती धरती के कारण होने वाली तबाही से बचा सकते हैं।"

हाउस की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और ग्लोबल वार्मिग समिति के अध्यक्ष एडवर्ड जे.मर्की ने कहा कि महत्वपूर्ण देशों द्वारा किया गया समझौता प्रक्रिया का अंत नहीं उसका आरंभ है।

परंतु फेंड्स ऑफ अर्थ के अध्यक्ष एरिक पिका ने कोपेनहेगन में हुए समझौते को शर्मनाक बताते हुए कहा कि यह किसी भी देश की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप नहीं है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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