पारदर्शिता के बगैर समझौता नहीं : हिलेरी
कोपेनहेगन, 17 दिसम्बर (आईएएनएस)। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने गुरुवार को कहा कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं के अंतर्राष्ट्रीय नियमों के तहत पारदर्शी तरीके से जलवायु परिवर्तन से निपटने के कदम उठाए बगैर जलवायु परिवर्तन पर कोई समझौता नहीं होगा।
क्लिंटन ने इस संबंध में चीन का ही नाम लिया लेकिन इसमें भारत, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील भी शामिल हैं। क्लिंटन ने कहा कि उपायों में पारदर्शिता होनी चाहिए। इससे जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए संधि की ओर बढ़ने की पूरी प्रक्रिया को विश्वसनीयता हासिल होगी।
भारत के पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने तुरंत इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, "मैं उनसे 75 प्रतिशत सहमत हूं, पूरी तरह नहीं।"
अमेरिकी और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के बीच जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों पर संधि में झगड़े की वजह अर्थव्यवस्था में हरित प्रौद्योगिकी के उपयोग की अंतर्राष्ट्रीय निगरानी है। भारत और चीन इसे अपनी संप्रभुता के खिलाफ बताते हुए पहले से ही इसका विरोध कर रहे हैं।
क्लिंटन ने ग्लोबल वार्मिग से निपटने के लिए वर्ष 2020 तक गरीब देशों को हर वर्ष 100 अरब डॉलर की सहायता के प्रस्ताव से कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन को विफल होने से बचाने का भी प्रयास किया।
प्रस्ताव का ब्योरा दिए बिना क्लिंटन ने भीड़ भरे संवाददाता सम्मेलन में कहा कि यह धन निजी और सरकारी स्रोतों से जुटाया जाएगा। इसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए वनीकरण और अन्य द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय परियोजनाओं पर खर्च किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि सबसे गरीब और कमजोर देशों को इस वित्तीय मदद का लाभ दिया जाएगा।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए गरीब देशों की वित्तीय मदद शिखर सम्मेलन के दो सबसे बड़े गतिरोधों में से एक है। गरीब देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से जलवायु परिवर्तन की समस्या पैदा करने वाले धनी औद्योगिक देशों से मुआवजा चाहते हैं।
क्लिंटन की घोषणा का जहां अधिकांश स्वयंसेवी संगठनों ने स्वागत किया वहीं विकासशील देशों के प्रतिनिधियों को इस बारे में संदेह है। बांग्लादेश के एक प्रतिनिधि ने आईएएनएस से कहा, "हम आश्वस्त होना चाहते हैं कि यह मौजूदा सहायता को भी गिनने का कोई तरीका तो नहीं है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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