महँगाई के बीच मौद्रिक नीति

औद्योगिक उत्पादन की दर में वृद्धि और खाद्य पदार्थो की ऊंची कीमतों के कारण महंगाई में हो रही बढ़ोत्तरी के बीच भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा करेगा. आरबीआई के गवर्नर डी सुब्बाराव मंगलवार को मौद्रिक नीति की तीसरे तिमाही की घोषणा करेंगे.
संभावना व्यक्त की जा रही है कि प्रमुख दरों को अपरिवर्तित रखने के साथ मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए नकद आरक्षित अनुपात को बढ़ाया जा सकता है.
आर्थिक विशेषज्ञ डॉक्टर आलोक पुराणिक ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि मुद्रास्फीति की दर इतनी ऊंची नहीं है कि उसका दबाव आरबीआई गवर्नर पर हो और वो इसको लेकर चिंतित हों.
उनका कहना था,'' मुझे नहीं लगता है कि मौद्रिक नीति में भारी परिवर्तन होगा. लेकिन आने वाले दिनों में ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी हो सकती है.''
तीन माह पहले पहली तिमाही समीक्षा के दौरान आरबीआई ने प्रमुख दरों को अपरिवर्तित रखा था लेकिन सचेत किया था कि मुद्रास्फीति की दर पांच फ़ीसदी तक पहुँच सकती है.
रेपो और रिवर्स रेपो
अप्रैल में सुब्बाराव ने रेपो और रिवर्स रेपो दर में 25 आधार अंकों यानी 0.25 फीसदी की कटौती की थी जबकि बैंक दर और नकद आरक्षित अनुपात को अपरिवर्तित रखा था.
विभिन्न वाणिज्यिक बैंक अपना पैसा रिज़र्व बैंक के ख़जाने में जमा करते हैं. इस पर रिज़र्व बैंक जिस दर से ब्याज़ देता है उसे रिवर्स रेपो दर कहते हैं.
जबकि रेपो दर ठीक इसके उलट होती है. जब रिज़र्व बैंक अन्य बैंकों को कम अवधि के लिए उधार देता है तो उस पर जिस दर से ब्याज लिया जाता है उसे रेपो दर कहते हैं.
वर्तमान में रेपो दर 4.75 फीसदी है और रिवर्स रेपो दर वर्तमान में 3.25 फीसदी है. रेपो दर बढ़ने से खुदरा कारोबार करने वाले बैंक रिज़र्व बैंक में ही पैसा रखना फ़ायदेमंद समझते हैं क्योंकि उन्हें अधिक ब्याज मिलता है.
दूसरी ओर रिवर्स रेपो दर बढ़ने से बैंकों को रिज़र्व बैंक से उधार लेने पर अधिक ब्याज का भुगतान करना पड़ता है. दोनों तरह की ब्याज़ दरें बढ़ने से मुद्रा बाज़ार में नकदी की कमी होती है और इससे माँग घटती है जिससे कीमतों पर अंकुश लगता है.












Click it and Unblock the Notifications