'सभी भाषाओं में हों सूचना का अधिकार'

केन्द्रीय सूचना आयोग के चौथे वार्षिक सम्मेलन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस तरह के असंतोष ही प्रशासनिक प्रक्रिया की लापरवाही को दूर करते हुए सरकार पर अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने का दबाब बनाते हैं। उपराष्ट्रपति ने चिता व्यक्त करते हुए कहा कि आरटीआई अधिनियम पर सूचना के साथ अधिनियम का अनुवाद हमारे संविधान की 8वीं सूची में परिगणित 22 भाषाओं में उपलब्ध नहीं है।
कार्मिक, जन शिकायत और पेंशन मंत्रालय की वेबसाईट पर सिर्फ 11 भाषाओं में ही आरटीआई उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि राज्यों के सूचना आयोगों की वेबसाइटों पर ना तो आरटीआई अधिनियम और ना ही आंकड़ें उपलब्ध हैं। इस मुददे को शीघ्रातिशीघ्र हल किये जाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि नागरिकों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील और समानुभूति का व्यवहार रखते हुए यथार्थ आबंटन और उनका सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि इस प्रवृत्ति में सूचना का अधिकार अधिनियम कोई अपवाद नहीं है।
जब 2005 में यह पारित हुआ था, तब इसका यह कहकर स्वागत किया गया था कि यह सरकार और नागरिकों के बीच संतुलन में बुनियादी बदलाव के उदेश्य से उठाया गया एक क्रांतिकारी कदम है। लेकिन तब चार वर्षो में, इस कानून से भी असंतोष देखने में आया है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि पर्याप्त कार्यान्वयन को देखते हुए, सूचना आयुक्तों के सम्मेलन में गंभीर और सक्रिय विचार-विमर्श होना चाहिए।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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