बिहार में बाहरी लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं
न्यायालय ने अनुसूचित जाति कोटे से बहाल दो न्यायिक पदाधिकारियों संजीव कुमार और मनोज कुमार की नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया। न्यायालय ने बिहार लोक सेवा आयोग को योग्यता सूची (मेरिट लिस्ट) में दोनों न्यायिक पदाधिकारियों के ठीक नीचे के दो सफल उम्मीदवारों का नाम अनुसूचित जाति कोटे से नियुक्ति के लिए अनुशंसित करने का आदेश भी दिया है। साथ ही सरकार को तुरंत नियुक्ति संबंधी आदेश जारी करने का निर्देश दिया है।
याचिकाकर्ता ने दोनों न्यायिक पदाधिकारियों की नियुक्ति को इस आधार पर चुनौती दी थी कि दोनों राज्य के बाहर के निवासी हैं। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता रवीन्द्र कुमार ने न्यायालय में दलील दी कि दोनों उत्तर प्रदेश के निवासी हैं तथा उसी राज्य के मतदाता भी हैं। इनका स्थायी पता भी बिहार का नहीं है। ऐसे में अनुसूचित जाति के कोटे से आरक्षण का लाभ दोनों को दिया जाना कानून के विरूद्घ है।
कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश चन्द्रमौली कुमार प्रसाद तथा श्याम किशोर शर्मा की खंडपीठ ने बालेश्वर प्रसाद रजक की ओर से दायर याचिका पर गुरुवार को यह फैसला सुनाया।
दूसरी ओर दोनों न्यायिक पदाधिकारियों की ओर से बहस कर रहे अधिवक्ता विंध्यांचल सिंह ने न्यायालय को बताया कि उनके पिता महातम प्रसाद वर्ष 1980 से ही बिहार न्यायिक सेवा के वरिष्ठ पदाधिकारी हैं और वर्तमान समय में बिहारशरीफ में कार्यरत हैं। लगभग 29 वर्षो से वे बिहार में ही रह रहे हैं और इसी के तहत अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र भी सक्षम पदाधिकारी द्वारा जारी किया गया था। ऐसे में दोनों की नियुक्ति को अवैध नहीं माना जा सकता लेकिन न्यायालय ने सिंह की दलीलों को मानने से इंकार करते हुए उक्त आदेश दिया।
उल्लेखनीय है कि संजीव कुमार और मनोज कुमार को बिहार का निवासी मानते हुए उनकी नियुक्ति 26 वीं न्यायिक प्रतियोगिता परीक्षा में सफल होने के बाद वर्ष 2007 में अनुसूचित जाति कोटे से की गई थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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