अमेरिका ने अपने सैनिकों पर किया था मस्टर्ड गैस का परीक्षण
टोरंटो, 14 जनवरी(आईएएनएस)। अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्घ के दौरान अपने हजारों सैनिकों पर मस्टर्ड गैस का परीक्षण कर यह जानने की कोशिश की थी कि किसी नस्ल पर इसका कितना असर पड़ता है। एक कनाडाई इतिहासकार ने अपने शोध पत्र में इसका खुलासा किया है।
अल्बर्टा विश्वविद्यालय की इतिहासकार सुसान स्मिथ के मुताबिक अमेरिका ने अपने श्वेत, अफ्रीकी-अमेरिकी, जापानी-अमेरिकी और प्यूरिटो रिकन सैनिकों की त्वचा पर इस गैस का परीक्षण कर यह जानने की कोशिश की थी कि विभिन्न नस्लों पर इसका क्या असर पड़ता है।
एंटी-रेसिज्म एंड डिकोलोनाइजेशन नेटवर्क ब्राउन बैग लंच सीरीज के तहत पेश अपने शोध पत्र में उन्होंने लिखा है, "यूं तो युद्घ के दौरान मस्टर्ड गैस का इस्तेमाल कभी नहीं किया गया, लेकिन यह परीक्षण खासकर जापान को ध्यान में रखकर किया गया। तब अमेरिका जापान को सबक सिखाने पर आमादा था। वह जापान को हराने की तरकीबें ढूंढने में लगा था। इस परीक्षण का उद्देश्य श्वेत समुदाय, खासकर अमेरिकी श्वेत समुदाय, के हितों की रक्षा करना था।"
उन्होंने लिखा है कि 70,000 से अधिक सैनिकों पर इस गैस का परीक्षण करने से पहले शिकागो विश्वविद्यालय, कॉर्नेल विश्वविद्यालय और रॉकफेलर इंस्टीट्यूट में इस रसायन का प्रयोगशाला परीक्षण किया गया। मस्टर्ड गैस की महक सरसों के तेल जैसी होती है।
परीक्षण के तौर पर एक विमान से सैनिकों पर यह गैस छोड़ी गई। कई सैनिकों को गैस चैंबर से भी गुजारा गया। सैनिकों को इस पर खामोशी बरतने को कहा गया था, लेकिन इनमें से कई की त्वचा पर जब 80 और 90 के दशक में असर दिखाई देने लगे तो इसका खुलासा हो गया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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