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सिंहावलोकन 2008 : महंगाई की मार से शुरू हुआ गुजरता साल युद्ध का संकेत दे गया

By Staff
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नई दिल्ली, 30 दिसम्बर (आईएएनएस)। भारतीय राजनीति ने वर्ष 2008 में कई रंग देखे। महंगाई ने आसमान छुआ। परमाणु करार के मुद्दे पर वामदलों द्वारा समर्थन वापसी के बाद सरकार को विश्वास मत तक हासिल करना पड़ा। संसद में नोटों की गड्डियां लहराई गईं। वैश्विक मंदी की मार ने कई लोगों को सड़कों पर ला दिया तो मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले ने साल के जाते-जाते पाकिस्तान के साथ संबंधों को युद्ध की गरमी तक पहुंचा दिया। इसी साल देश को आतंकवाद का एक नया संस्करण देखने को मिला जिसमें भगवाधारी कुछ कथित साधु-साध्वी और सेना के कुछ अफसरों पर कतिपय आतंकवादी वारदातों में लिप्त होने का आरोप लगा।

साल भर देश की जनता को महंगाई की मार झेलनी पड़ी। आम उपभोग की वस्तुओं के दाम इतने बढ़े कि क्या आम और क्या खास, महंगाई ने सबकी कमर तोड़ कर रख दी। वैश्विक स्तर पर पेट्रोलियम पदार्थो की बढ़े दाम इसकी वजह बताए गए। बहरहाल, साल खत्म होते-होते पेट्रोलियम पदार्थो की अंतर्राष्ट्रीय कीमतें दोगुनी से भी कम हुई है। इसका असर भारतीय बाजार में भी दिखा। उधर महंगाई की दर घटकर साल के सबसे न्यूतम स्तर तक पहुंच गई है।

आरक्षण की मांग को लेकर राजस्थान में गुर्जरों का आंदोलन हुआ तो महाराष्ट्र में मराठी और गैर मराठी विवाद ने हिंसात्मक रुख अख्तियार कर लिया। देश में जातीयता व क्षेत्रीयता के नाम पर नई राजनीतिक कलह छिड़ गई। इसके बाद उड़ीसा के कंधमाल में ईसाई विरोधी हिंसा और जम्मू कश्मीर में श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन आवंटित किए जाने को लेकर पैदा हुए विवाद के बाद महीनों आंदोलन चला।

इन घटनाओं के साथ-साथ यह साल कई आतंकवादी घटनाओं का भी साक्षी बना। दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, असम और महाराष्ट्र समेत देश के विभिन्न हिस्सों में विस्फोट हुए और सैकड़ों लोगों की जानें गई। आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद नहीं रहा बल्कि वह भी सम्प्रदायों में बंट गया। हिन्दू आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल शुरू हो गया। क्योंकि मालेगांव, नांदेड़ बम धमाकों व समझौता एक्सप्रेस में हुए धमाकों में भगवाधारी कुछ कथित साधु-साध्वी और कुछ सैन्य अधिकारियों के भी नाम इसमें सामने आए। सत्ता पक्ष और विपक्ष में आतंकवाद के नाम पर जमकर रस्साकशी चलती रही।

आतंकवाद के मुद्दे पर विपक्ष सरकार पर कड़े कानून बनाने का दबाव डालता रहा लेकिन सरकार को यह मंजूर नहीं हुआ लेकिन मुंबई हमले के बाद सरकार की निद्रा टूटी। जनता और विपक्ष के चौतरफा दबाव के बाद सरकार कड़े कानून बनाने और एक राष्ट्रीय जांच एजेंसी के गठन को तैयार हुई।

बहरहाल, मुंबई हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर चौतरफा दबाव बनाने में जरूर सफलता हासिल की। उसे अमेरिका समेत विश्व भर के सभी प्रमुख देशों का समर्थन मिला। इसका असर भी पड़ा और पाकिस्तान दबाव में आया लेकिन कोई ठोस कार्रवाई करने की बजाए उसने फिर से अपना पुराना राग अलापना आरंभ कर दिया। वह खुद को आतंकवाद का मारा बता रहा है और हवाला दे रहा है कि उसकी पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो भी आतंकवाद की ही शिकार हुईं।

भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो या न हो यह तो भविष्य के गर्त में है लेकिन यह तो स्पष्ट दिख रहा है कि दोनों देशों के बीच एक बार फिर युद्ध के हालात जरूर बन गए हैं।

महंगाई और आतंकवाद के बाद वैश्विक आर्थिक मंदी की मार ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया। कंपनियों ने इस मार से बचने के लिए अपने कर्मचारियों की छंटनी करनी आरंभ की। हजारों रोजगारशुदा युवा रातोंरात सड़कों पर आ गए। मंदी की मार का असर आम आदमी पर भी देखने को मिला। कुल मिलाकर बड़ी-बड़ी कंपनियों से लेकर आम आदमी तक को अपने खर्च में कटौती करनी पड़ी।

इन सबके बीच, भारतीय राजनीति में वह काला दिन भी आया जब 22 जुलाई को विश्वास मत के दौरान संसद में नोटों की गड्डियां लहराई गईं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को संसद में विश्वास मत हासिल करना था। इससे पहले ही यह हो-हल्ला हो चुका था कि सांसदों की खरीद फरोख्त की जा रही है और उन्हें करोड़ो रुपये तक की पेशकश की जा रही है। हद तो तब हो गई जब भाजपा के तीन सांसद नोटों से भरा एक बैग लेकर लोकसभा में घुस आए और नोटों की गड्डियों को यह कहते हुए हवा में लहराने लगे कि सत्ताधारी दल ने मतदान से दूर रहने के लिए उन्हें यह पैसे दिए हैं। जनता के प्रतिनिधियों का यह गंदा खेल देखकर पूरा देश शर्मसार हो रहा था और संसद की दीवारें इसकी गवाह बन रही थीं।

इससे पहले, देश की राजनीति ने उस वक्त करवट बदला जब सरकार को बाहर से समर्थन दे रही वामपंथी पार्टियों ने परमाणु करार के मुद्दे पर केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। सरकार अल्पमत में आती, इससे पहले कांग्रेस की कभी धुर विरोधी रही समाजवादी पार्टी (सपा) ने सरकार की पालकी का कहार बनना तय किया। इन सबके बीच वामदलों ने बसपा सुप्रीमो मायावती, एआईएडीएमके की प्रमुख जयललिता और टीडीपी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू को साधकर तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद शुरू की और देश में जारी गठबंधन की राजनीति को नए समीकरण से एक नया आयाम देने की कोशिश की है।

विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों मसलन महंगाई, आतंकवाद और क्षेत्रवाद के नाम पर देश के राजनीतिक दलों ने जमकर अपनी-अपनी रोटियां सेंकी मगर इन मुद्दों पर जहां सभी को एकजुट होने की जरूरत थी, वहां भी इन दलों में राजनीतिक एकजुटता का अभाव दिखा।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गठबंधन की राजनीति को नया आयाम देने में सफल रहे हैं। विपक्ष भले ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) को अस्वाभाविक गठबंधन बताता रहा हो लेकिन मनमोहन सिंह ने साढ़े चार साल से अधिक का अपना कार्यकाल पूरा कर उसे गलत साबित कर दिया है। संप्रग ने वाम दलों का साथ खोया तो सपा का उसे साथ भी मिला। कांग्रेस गठबंधन की राजनीति नहीं चला सकती, इस मिथक को भी मनमोहन सिंह ने निर्मूल साबित कर दिखाया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी खुद को इस दौरान राजनीति के कुशल खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने में सफल रही हैं।

उधर, प्रमुख विपक्षी दल और उसके नेता लालकृष्ण आडवाणी पहले पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनें फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने भी उन्हें बतौर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार किया। वे प्रधानमंत्री बनने की हसरत पाले हुए हैं और इसके लिए अपने राजनीतिक जीवन के संध्याकाल में अपनी कट्टर छवि को उदार छवि में तब्दील करने कवायद करने में भी लगे हुए हैं। उन्हें कांग्रेस और तमाम विरोधियों के अलावा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती से भी चुनौती मिल रही है क्योंकि उनकी नजरें भी दिल्ली की ही गद्दी पर टिकी है।

देश की राजनीति में वंशवादी राजनीति के नए रंगरूटों ने भी इस वर्ष अपना स्थान बनाया, खासकर कांग्रेस की राजनीति में। राहुल गांधी के करीबी समझे जाने वाले मध्यप्रदेश के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया और उत्तरप्रदेश से सांसद जितिन प्रसाद को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया।

चुनावों की दृष्टि से भी यह साल कई संकेत छोड़ गया। अक्सर सत्ताविरोधी रूझानों के चलते सरकारें बनती-बिगड़ती देखी जाती रही है लेकिन 2008 में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने जताया कि अक्सर यह सच नहीं हो सकता क्योंकि यदि विकास के काम किए जाए और उसे मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा जाए तो भी जीत संभव है। मध्यप्रदेश, दिल्ली और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों ने तो कम से कम यही दर्शाया।

जम्मू कश्मीर में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा के चुनाव और वहां के नतीजों ने भी जम्हूरियत के जज्बे को और मजबूत किया। अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार की घोषणा की हवा निकालते हुए वहां की जनता ने रिकार्ड मतदान किया। चुनावी नतीजे जो भी रहे हैं सभी दलों ने एक सुर में इसे आतंकवाद और अलगाववाद पर लोकतंत्र की जीत बताया।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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