Success Story: पिता ने चाय बेच, मां ने मजदूरी कर बेटे को बनाया SDM, जानें अब मां को क्या बोलते लोग?
RPSC RAS Success Story: राजस्थान प्रशासनिक सेवा में साल 2021 बैच के RAS अफसर हुक्मीचंद रोलनिया भीलवाड़ा के मांडल में SDM हैं। इनकी सक्सेस स्टोरी प्रेरणादायी है, जिसमें खुद की मेहनत, भाई-भाभी साथ व मां-पिता का 'पहाड़ सा हौसला' है।
हुक्मीचंद रोलनिया मूलरूप से राजस्थान में सीकर जिले खंडेला के पास छोटे से गांव दूल्हेपुरा के रहने वाले हैं। वर्तमान में बतौर उपखंड अधिकारी पहली पोस्टिंग है।

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वन इंडिया हिंदी से बातचीत में एसडीएम हुक्मीचंद रोलनिया की मां शांति देवी ने बताया कि एक वक्त था जब हुक्मीचंद के पिता खंडेला मोड पर चाय की दुकान चलाया करते थे और मैं खेतों में मजदूरी करने जाती थी।
शांति देवी कहती हैं कि मैं अनपढ़ और पति हरदेव सिंह आठवीं तक पढ़े लिखे थे, मगर पढ़ाई का मोल बखूबी जानते थे। यहीं वजह है कि दो बेटे हुक्मीचंद व धर्मराज व तीन बेटियों गुलाब, बबीता और सुनीता के स्कूल-कॉलेज की ओर बढ़ते कदम कभी नहीं रोके। नतीजा यह रहा कि दोनों बेटे सरकारी नौकरी लग गए।
शांति देवी का सबसे बड़ा बेटा धर्मराज रोलानिया व उनकी पत्नी कस्तूरी देवी जयपुर में सरकारी सीनियर नर्सिंग अफसर हैं। एसडीएम बेटा हुक्मीचंद रोलानिया सबसे छोटा है। सभी भाई-बहनों की शादी हो चुकी है। हुक्मीचंद की शादी पिछले माह ही मंजू देवी के साथ हुई है।
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शुरुआती पढ़ाई गांव के स्कूल से
हुक्मीचंद की बहन सुनीता ने बताया कि 7 जुलाई 1992 को जन्मे छोटे हुक्मीचंद ने आठवीं तक की पढाई गांव के स्कूल व 12वीं तक की पढ़ाई सीकर की नवजीवन से की। फिर कुरुक्षेत्र से बीटेक की डिग्री ली।
हुक्मीचंद ने दो बार क्रैक की RPSC
बीटेक करने के बाद हुक्मीचंद जयपुर में पोस्टेड भाई-भाभी के पास आ गया और राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की तैयारियों में जुट गया। साल 2016 में पहले में 700 से अधिक रैंक मिली। साल 2018 में दूसरे प्रयास में 18वीं रैंक लाकर एसडीएम बन गया।
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दूसरों के खेत में लावणी करवाने जातीं
शांति देवी कहती हैं कि बच्चों को पढ़ाई के लिए मैं खुद खेतों में लावणी करने, खेजड़ी छंगवाने के काम में मजदूरी करने जाती थी। बड़ा बेटा नर्सिंग अफसर बना तो पति ने चाय की दुकान छोड़ दी और अब दूसरा बेटा भी एसडीएम बन तो अब मैं सिर्फ अपने खेत में ही काम करती हूं।
अब एसडीएम की मां हो...?
शांति देवी कहती हैं कि अक्सर यह सुनने को मिलता है कि अब तो आप तो नर्सिंग ऑफिसर के साथ-साथ एसडीएम की मां भी हो खेत में मजदूरी करना छोड़ दो। मेरा जवाब होता है कि यही मेरा कर्म है। इसे कैसे छोड़ दूं। इसी के दम पर बेटे कामयाब हुए हैं।












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