पाकिस्तानः भारत भी नहीं रहेगा बेअसर

जनरल मुशर्रफ आम तौर पर ऐसी बातें करते हैं जो सच्चाई की कसौटी पर फेल होती रहती है और अपने लोगों को मुगालते में रखती है लेकिन उनकी यह बात सच्चाई को साफ बयान करती है। अभी कुछ दिन पहले पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भी पाकिस्तान के अस्तित्व पर संकट की बात की थी।
भारत में उनके इस बयान पर दो तरह की प्रतिक्रिया हुई थी। एक तो वे लोग थे जो पाकिस्तान को हमेशा एक फालतू चीज मानते है और उनकी कोशिश रहती है कि पाकिस्तान खंड-खंड हो जाय तो अच्छा है। इस वर्ग में ज्यादातर वे लोग है जिन्हें गैर जिम्मेदार कहा जा सकता है। भारत के दूसरे वर्ग के लोगों में पाकिस्तानी राष्ट्रपति के बयान के बाद बहुत चिंता हुई थी।
पाकिस्तान की खुशहाली भारत हित में
बु़द्धजीवियों और उदावादियों का एक बड़ा वर्ग पाकिस्तान को नष्ट नहीं होने देना चाहता। आम तौर पर सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों से पिछले 30-32 वर्षों में जब भी आफ द रिकार्ड बातचीत का मौका मिला तो यही तस्वीर उभरती है कि भारत के हित में यही होगा कि पाकिस्तान में एक स्थिर सरकार रहे और सामाजिक राजनीतिक स्थिरता का माहौल बना रहे। इससे पाकिस्तान का भला तो होगा ही, भारत के विकास के लिए भी यह जरूरी होगा।
यहां एक दिचस्प बात यह है कि भारत के हुक्मरान हमेशा से ही स्थिर पाकिस्तान तो चाहते हैं लेकिन मजबूत पाकिस्तान नहीं उनका तजुर्बा है कि मजबूत या मजबूती का मुग़ालता
होने पर भी पाकिस्तान गैर जिम्मेदार आचरण करने लगता है। 1995 का युद्ध इस सोच की सबसे बड़ी मिसाल है जब एक फौजी जनरल के नेतृत्व में पाकिस्तानी सियासत में शुतुरमुर्ग सोच ने जड़ पकड़ ली और बैठे-बिठाए एक युद्ध हो गया। सभी जानते हैं कि वह युद्ध बचाया जा सकता थ। हालांकि युद्ध कहीं भी हो कैसा भी हो, शांति के खिलाफ होता है धरती की कोख को बांझ करता है इसलिए युद्ध का समर्थन तो कभी नहीं किया जा सकता।
तारीख़ में मौजूद थे बिखराव के बीज
1971 की लड़ाई भी ऐसी लड़ाई है जो न हुई होती तो अच्छा था 1971 में संयुक्त पाकिस्तान की अवाम ने शेख मुजीबुर्रहमान को नेता चुना था, लेकिन इस्लामाबाद में बैठे पाकिस्तानी जनरल ने इसे स्वीकार नहीं किया और एक ऐसी लड़ाई हो गई, जिसकी जरूरत नहीं थी। उस समस्या का भी राजनीतिक हल संभव था लेकिन कोशिश ही नहीं की गई और हालात बिगड़ गए। पाकिस्तानी समाज में 1971 के बाद जो बिखराव का सिलसिला शुरू हुआ वह अभी तक जारी है और आज पाकिस्तानी सत्ता के दो बड़े स्तंभ परवेज मुशर्रफ और आसिफ अली जरदारी खुले आम स्वीकार कर हे हैं कि पाकिस्तान के सामने अस्तित्व का संकट है।
पाकिस्तान के इतिहास पर गौर करें तो साफ नज़र आ जाएगा कि उसकी बुनियाद में ही सत्ता के लिए उठापटक सिद्धांत दर्ज है। इतिहास का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि कांग्रेस की राजनीति में मोहन दास करम चंद गांधी से पिछड़ जाने के बाद मुहम्मद अली जिन्ना ने सियासत से अलविदा कह दिया था और लंदन में जाकर वकालत शुरू कर दिया था। लियाकत अली ही उन्हें लंदन से वापस लाए। उन्हें लंदन से वापस लाकर मुस्लिम लीग के जरिए पाकिस्तान आंदोलन को शुरू करने का श्रेय लियाकत अली के विरोधी भी उन्हें देते हैं लेकिन जिस तरह से पाकिस्तान के शुरूआती दिनों में ही लियाकत अली को मार डाला गया, वह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं था।
उसके बाद तो पाकिस्तान में लगातार फौज का दखल बढ़ता गया। 1971 में सही अर्थों में जनतंत्र की स्थापना का मौका मिला था लेकिन उस वक्त के फौज राष्ट्रपति याहया खां और महत्वाकांक्षी विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टों ने शेख मुजीब को सत्ता देने से इनकार कर दिया। जानकार बताते है कि इसी फैसले के बाद बांग्लादेश का जन्म हो गया, बल्कि यह कहना ठीक होगा कि इसी फैसले का नतीजा था कि पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए और पूर्वी पाकिस्तान हमेशा के लिए पश्चिमी हिस्से से अलग हो गया।
सामंती व्यवस्था बनी नासूर
उसके बाद भी तमाम ऐसे फैसले हुए जिसकी वजह से पाकिस्तान में अराजकता का महौल बनता गया। यहां पाकिस्तान के इतिहास की व्याख्या करना जरूरी नहीं है लेकिन यह समझ लेना जरूरी है कि पाकिस्तान में अस्थिरता और तबाही के लिए दो नीतियां सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। एक तो यह कि अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद वहां भूमि सुधारों की कोई कोशिश नहीं की गई सामंतवाद के ढांचे को ज्यों का त्यों रहने दिया गया। जिसका नतीजा यह हुआ कि जब कभी फौजी शासन के विकल्प के रूप में लोकतंत्र की व्यवस्था लागू करने की कोशिश की गई तो आम पाकिस्तानी सत्ता में किसी भी स्तर पर भागीदार नहीं बन सकता। वह अपने को शासित वर्ग के रूप में ही मानता रहा।
इस बात का सबसे दिलचस्प उद्हारण है स्वात घाटी के इलाके में तालिबान का क़ब्जा। हुआ यह कि स्वात घाटी के विस्तृत इलाके पर कुल चार बड़े पैमाने पर नाराजगी थी तालिबान ने इसी नाराजगी को हवा दी और जमींदारों के खिलाफ एक वर्ग संघर्ष का महौल बना दिया यानी स्वात में तालिबान के कब्जे से आम आदमी पर कोई असर नहीं पड़ा उल्टे उसी खुशी ही हुई कि जमींदारों के आतंक से पिंड छुटा। स्वात घाटी से ताल्लुक रखने वाले अफसरों के अनुसार इन चंद संपन्न जमींदारों की स्वात में कोई राजनीतिक हैसियत न थी और न है। उन जमींदारों के खिलाफ मामूली किसानों के गुस्से को तालिबान ने एक सिस्टम के तरह संगठन का रूप दिया और उस संगठन को हाथियारों से लैस कर दिया।
लोकप्रिय हो सकता है 'स्वात मॉडल'
पाकिस्तान अधिकारियों का कहना है कि अगर तुरंत कोई कारगर कार्रवाई न ही गई तो स्वात में तालिबान ने किसानों को साथ लेने का जो मॉडल विकसित किया है उसे असानी से पंजाब में भी लागू कराने का प्रयास करेगा पंजाब में भी वही सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां हैं जो स्वात में थी और बड़े जमींदार मामूली किसानों का शोषण कर रहे हैं।
स्वात घाटी में शरिया कानून लगाए जाने पर बाकी दुनिया में जो हड़कंप मचा है उस पर भी गौर करने की जरूरत है पाकिस्तान एक इस्लामी मुल्क है और वहां शरिया लगाने में कोई बुराई नहीं है शरिया एक ऐसी व्यवस्था है जिससे किसी मुसलमान को एतराज नहीं होना चाहिए लेकिन शरिया के नाम पर जो आंतक किए जा रहे है और उसके खिलाफ जो महौल बनाने की कोशिश की जा रही है उससे बचने की जरूरत है इसका नुकसान यह हो रहा है कि पश्चिम में शरिया और इस्लाम के प्रति ऐसा पब्लिक ओपिनियन बन रही है जो बहुत ठीक नहीं है।
इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के मौलाना अब्दुल अजीज ने कहा कि वह दिन दूर नहीं है जबकि पूरे पाकिस्तान में शरिया कानून लागू हो जाएगा यह वही लाल मस्जिद है जिस पर परवेज मुशर्रफ की सरकार ने गोले बरसाए थे जिसमें कई लोगों की जाने भी गई थी। जाहिर है कि मौलाना साहब की बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भूमि सुधार और जमींदारी प्रथा को न खत्म करना 1947 के बाद के पाकिस्तानी हुक्मरानों की गलती थी जिसकी वजह से समाज में गैर बराबरी की जो स्थित थी वह बद से बदतर होती गयी और आज हालात ऐसे है कि पाकिस्तान के अस्तित्व पर ही संकट के बादल लहरा रहे है।
पाकिस्तान की तकलीफों से भारत भी बेअसर नहीं
अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को चाहिए कि वह हर संभव कोशिश करे, जिससे पाकिस्तान का बिखराब फौरन रोका जा सके। पाकिस्तान के बर्बाद होने से उस देश का राजनीतिक अस्तित्व तो खत्म हो जायेगा। लेकिन वहां की पूरी आबादी को जो तकलीफें होगी उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। पाकिस्तानी अवाम को जो तकलीफ पहुंचेगी उसका दर्द भारत की आबादी के एक बड़े वर्ग को दो स्तर पर होगा। एक तो यह कि इंसानियत को कही भी तकलीफ पहुंचे, सभ्य आदमी को परेशानी होती है। दूसरा यह कि हमारे बहुत सारे रिश्तेदार संगे संबंधी हैं, लिहाजा पाकिस्तान तबाह होगा तो उन लोगों के आशियाने भी उजड़ जाएंगे।
यह दर्द सिर्फ भारत में महसूस किया जायेगा। अमरीका इस दर्द को समझ ही नहीं सकता। इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि वह अपनी पूरा ताकत का इस्तेमाल करके पाकिस्तान को तबाह होने से बचाए। क्योंकि एक स्थिर पाकिस्तान भारत को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाएगा आतंकवाद के बढ़ रहे खतरे को अपनी ही जमीन पर रोकने में सक्षम होगा।












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