लोकतंत्र, अमरीकी दादागीरी और पाकिस्तान

Taliban
पाकिस्तान पर मुसीबत के बादल मंडरा रहे हैं। राष्ट्र के अस्तित्व पर ही संकट आ गया है। देश के कुछ हिस्सों पर पाकिस्तानी हुकूमत की मर्जी के खिलाफ कुछ ऐसे लोगों ने कब्ज़ा कर लिया है जो किसी तरह के नियम कानून को नहीं मानते, मनमानी की बात करते हैं।

तालिबान नाम के इस संगठन को अमरीका के पैसे से पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति स्व.जियाउलहक ने बनाया था। जनरल जिया ने आतंकवाद का इस्तेमाल अपने विरोधी देशों को काबू में रखने के लिए किया। अफगानिस्तान में तो अल क़ायदा और तालिबान को आगे किया लेकिन भारत में कश्मीरी मूल के नौजवानों को आगे करके आतंक का ताना बाना बनाया।

पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन आंतरिक आतंकवाद

जब आतंक को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाने के लिए जनरल ज़िया मेहनत कर रहे थे, तो उनके शुभचिंतकों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि वे बहुत ही खतरनाक खेल में शामिल हो गए हैं। आतंकवादी का कोई भरोसा नहीं, पता नहीं कब वह अपने मालिक के खिलाफ खिलाफ ही खड़ा हो जाय। तालिबान और अलकायदा की नीतियों के चलते पाकिस्तान और अफगानिस्तान को दुनिया भर के देशों की फटकार सुननी पड़ रही है।

आज पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन आतंरिक आतंकवाद ही है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस बात को खुद सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं। और अब अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति पर चिंता जताई है। ओबामा ने कहा कि वे पाकिस्तान की आतंरिक हालत को बहुत ही खतरनाक मानते हैं। उनको डर है कि कहीं तालिबान पूरे देश पर कब्जा न कर लें। उन्होंने जोर देकर कहा कि उन्हें इस बात की बहुत चिंता है कि पाकिस्तान की सिविलियन सरकार बहुत ही कमजोर है।

सबसे बड़ा खतरा लोकतंत्र को

ओबामा की इस बात से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गीलानी नाराज हो गए और कहा कि ओबामा जो कुछ कहा वह उनके निजी विचार हैं। इस प्रतिक्रिया का कोई मतलब नहीं है क्योंकि बाकी दुनियां के साथ-साथ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को भी मालूम है कि पाकिस्तान अपने इतिहास के सबसे भयानक दौर से गुजर रहा है। पूर्वी पाकिस्तान में जहां एक जन आंदोलन चल रहा था, अलग होकर बांगलादेश नाम का स्वतंत्र, संप्रभु देश बन गया था। पूर्वी पाकिस्तान में चले जन-आंदोलन का नेतृत्व शेख मुजीबुर्रहमान कर रहे थे, जो स्वयं लोकतंत्र के बड़े समर्थक थे।

इस वक्त पाकिस्तान में जो उथल पुथल है, वह किसी लोकतांत्रिक आंदोलन के कारण नहीं है बल्कि इस वक्त जो लोग पूरे देश में उत्पात मचाए हुए हैं वे एक लोकतांत्रिक सरकार को तबाह करना चाहते हैं। जरदारी की सरकार चाहे जितनी असहाय हो और अपने अस्तित्व के लिए अमरीका की कृपा पर आश्रित हो, लेकिन है वह लोकतांत्रिक सरकार और एक फौजी तानाशाह को बेदखल करके सत्ता में आई है।

पाकिस्तान बिखरने से सबसे ज्यादा दिक्कत अमेरिका को

पाकिस्तान में सरकार का स्थिर रहना पूरी दुनियां के हित में है। पाकिस्तान के बिखरने का नुकसान सबसे ज्यादा उसके पड़ोसी देशों को होगा लेकिन उनसे भी ज्यादा परेशानी अमरीका को होगी। अमरीकी राष्ट्रपति ने अपनी हुकूमत के सौ दिन पूरे करने पर जो प्रेस कांफ्रेंस की उसमें उन्होंने साफ कहा कि वे पाकिस्तान की संप्रभुता का सम्मान करते हैं, लेकिन उनको यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि पाकिस्तान से अमरीका के बहुत सारे सामरिक हित जुड़े हुए है।

उन्होंने कहा कि यह अमरीका के हित में है कि पाकिस्तान में स्थिरता रहे और उसके परणामु हथियार ऐसे लोगों के कब्जे में न चले जाये जो आतंकवादी हों। अमरीकी सरकार को यह याद आना अच्छी बात है कि पाकिस्तानी परमाणु हथियार आतंकवादियों के कब्जे में जाने से मुश्किल होगी। पिछले वर्षों से अमरीका पाकिस्तान में तबाही का खेल लगाकर दक्षिण एशिया की राजनीति को उथल पुथल में डालने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तानी जनता की कौन सुने?

पाकिस्तान में जितने भी जनरल सत्ता पर काबिज हुए है, सबको अमरीकी आशीर्वाद मिला हुआ था। पाकिस्तान में औद्योगिक विकास नहीं हुआ, इसके लिए भी अमरीका और पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान जिम्मेवार हैं। वैसे तो लियाकत अली से लेकर बेनजीर तक जितनी भी राजनीतिक हत्याएं हुई हैं, उनमें इसी जोड़ी का हाथ है। तकलीफ की बात यह है कि आज जब पाकिस्तानी अवाम मुसीबतों के दौर से गुजर रहा है तो अमरीका उस मुसीबत को अफगानिस्तान की हालत को बैलेंस करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। फौजी शासक अपने सुरक्षित मकानों में बैठे है।

पाकिस्तानी जनता को अंतर्राष्ट्रीय शतरंज में प्यादे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। पाकिस्तान की सिविलियन सरकार की मुसीबतें रोज-ब-रोज बढ़ रही है। तालिबान की नादिरशाही के आगे पाकिस्तानी जनता पिस रही है, भारत में पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने की नीति अपनाने की वकालत करने वालों की फौज सक्रिय हो गयी है और जरदारी सरकार को फौज का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर करने वाली अमरीकी हुकूमत को कुछ नहीं दिखता रहा है। उसे तो बस तालिबान के खिलाफ सैनिक कार्रवाई चाहिए।

अमेरिकी हुकूमत चिंता में

यहां यह साफ बार देना जरूरी है कि अमरीका का राष्ट्रपति कोई भी हो वह अमरीकी हितों के लिए ही काम करता है। इस मामले में बुश और ओबाना में कोई फर्क नहीं है। इस बात पर किसी को कोई एतराज नहीं हो सकता। हर शासक अपने राष्ट्रीय हित के लिए काम करता है। मुसीबत इसके बाद शुरू होती है जब अमरीकी साम्राज्यवादी सोच अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों के लिए किसी को भी तबाह करने पर आमादा हो जाती है। दुनिया जानती है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जो भी हो रहा है, वह अमरीका की अरब नीतियों के फेल होने की वजह से है। सारी दुनिया जानती है कि ओसामा बिन लादेन पहले अमरीका के दोस्त थे और अब वह उसके दुश्मन नं. एक बने हुए है।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तेजी से बदल रहे सुरक्षा के वातावरण से अमरीकी सरकार के कर्ताधर्ता घबड़ा गए हैं इस बीच अमरीकी हुकूमत ने पाकिस्तान को हड़काना शुरू कर दिया है। अमरीकी फरमान जारी हो गया है कि अगले दो हफ्ते में तालिबान को खत्म कर दो। अमरीकी सेंट्रल कमांड के कमांडर ने अमरीकी सरकार को खबरदार कर दिया है कि अगले दो हफ्ते पाकिस्तान सरकार के लिए बहुत मुश्किल होगे। अमरीकी कमांडर का दावा है कि पाकिस्तान के पास अब कोई बहाना नहीं बचा है और उसे अपनी रक्षा के लिए फौरन सक्रिय होना पड़ेगा।

पाकिस्तान दो-तरफा संकट में

पाकिस्तानी फौज ने तालिबान के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है लेकिन बिडंबना यह है कि यह कार्रवाई तालिबान के खिलाफ है जिसे कि अमरीका और पाकिस्तान की सरकारों ने मिलकर बनाया था। दूसरी बिडंबना यह है कि पाकिस्तान ने तालिबान पर यह हमला अमरीका के हुक्म के बाद बोला है यानी मौजूदा लड़ाई में अगर जीत होती है तो ज्यादा फायदा अमरीका का होगा। पाकिस्तान की तो हर हाल में मुसीबत है क्योंकि अगर तालिबान तबाह होते हैं तो वे होंगे तो पाकिस्तान के अपने बंदे ही। जरूरत इस बात की है कि पाकिस्तान और आसपास के इलाकों में अमरीकी दादागीरी को लगाम दी जाय और दुनिया भर के इंसाफ पसंद लोग एक होकर पाकिस्तान की सिविलियन हुकूमत को मजबूत बनने की तरक़ीबों पर गौर करें। आज पाकिस्तान की जनता अमरीकी साम्राज्यवादी हितों की लड़ाई में तबाह होने के खतरे के सामने खड़ी है।

जरूरत इस बात की है कि दुनिया भर के समाज इस बात पर जोर दें कि पाकिस्तान की सिविलियन सरकार को हटाकर किसी फौजी जनरल को गद्दी पर बैठाने का विरोध होना जरूरी है। आमतौर पर वहां यही होता आया है। मौजूदा राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी जब अपनी पत्नी, बेनजीर की हुकूमत के दौरान मिस्टर टेन परसेंट के रूप में जाने जाते थे तो उनकी फौज ने बराबर दखल दिया।

हालात बदलने की जिम्मेदारी बाकी दुनिया पर

सिविलियन सरकारों के भ्रष्टाचार से अब ऊब चुकी पाकिस्तानी जनता फौजी हुकूमतों का स्वागत करती है लेकिन बाद में पछताती भी है। इस हालत को बदलने की जिम्मेदारी बाकी दुनिया की है। इस बीच खबर है कि इसी हफ्ते आसिफ अली जरदारी को अमरीका तलब किया गया है। जरदारी को चाहिए कि अमरीका को यह समझाने की कोशिश करें कि पाकिस्तान में जब तक अवाम का इकबाल बुलंद नहीं होगा, तब तक वहां शांति और सुरक्षा का माहौल कायम नहीं होगा। हालांकि यह काम बहुत मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं और शुरुआत कैसी भी क्यों न हो करनी तो करनी ही पड़ेगी।

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