मदर्स डे: हर मां को सलाम

सच, भगवान का दूसरा नाम ही है माँ. हर जगह तो भगवान का जाना सम्भव नहीं हैं इसलिए उसने माँ को बना दिया. बेशक समय कितना ही बदल जाए पर हमारे देश के संस्कार ही ऐसे है कि माँ का प्यार ना कभी बदला है ना कभी बदलेगा.
बताने की बाते तो ढेर सी है पर मैं दो बाते ही बताऊगी. बचपन मे मुझे राजमाह चावल बहुत पसंद थे. पसंद तो अब भी हैं पर मैं तब की बात बता रही हूँ कि जब मैं और मेरा भाई स्कूल से लौट कर आते थे और पता चलता था कि आज राजमाह चावल बने हुए हैं. तो मैं सारे के सारे खा जाती थी, यानि मम्मी के हिस्से के भी. पर मम्मी कभी नही कहती थी कि यह चावल उनके हिस्से के है वो ना सिर्फ खुशी खुशी खिलाती बलिक बालो मे हाथ भी फेरती रहती. तब मै यही सोचती थी कि जब मै भी बडी हो जाऊगी तब मै अपने हिस्से के चावल खुद ही खाऊगी. अपने बच्चो को नही दूगी. पर माँ बनने के बाद अहसास हुआ कि सब कुछ तो बच्चो का ही है बच्चो ने खा लिया मानो माँ ने खा लिया. सच पूछो तो बच्चों को खुश देखकर, बच्चों की खुशी मे इतनी खुशी मिलती है, कि शब्दों में बताई नही जा सकती. यह बात माँ बनने के बाद ही जानी.
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मुझे याद है कि जब मै पहली बार घर से बाहर हॉस्टल पढ़ने गई थी, तब हमारी मैस में सब्जी के तो डोगे मेज पर रख देते और चपाती का एक एक से पूछ्ते थे, कि लेनी है या नही. पता है घर मे तो आदत थी, कि मना करने के बाद भी एक चपाती तो आएगी ही आएगी, क्योंकि मम्मी कहती यह छोटी सी चपाती तेरे लिए ही बनी है. अब जब मैस वाला भैया पूछ्ता कि और चाहिए तो मै यह सोच कर मना कर देती कि एक तो आएगी ही आएगी. पर मना करने के बाद वो भला क्यो चपाती देगा. हॉस्टल में शुरु में तो बहुत अजीब लगा पर धीरे-धीरे आदत पड़ गई बात खाने की नही है बात उस प्यार की है जो हमे मिला जो ऐसी यादे छोड़ गया, जो हमे जीवन भर नही भूलेगी.
वही आज हम अपने बच्चों मे देख रहे हैं कल को जब वो बडे़ हो जाएंगे, वही बात फिर से दोहराई जाएगी. सच पूछो तो ऐसी ममतामयी माँ से बार-बार लिपटने का मन करता है. मन करता है कि फिर से बच्चे बन जाए और माँ के आंचल से सारी दुनिया देखें जैसे बचपन मे देखते थे.












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