'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' NCERT की किताब में मनुस्मृति के श्लोक पर क्यों उठा विवाद? आमने-सामने आए एक्सपर्ट्स

NCERT की नौवीं क्लास की सामाजिक विज्ञान (Social Science) की नई किताब एक बार फिर चर्चा में है। इस बार विवाद की वजह इतिहास के नए सिलेबस में पुराने भारत के समाज और महिलाओं की स्थिति को लेकर लिखी गई बातें हैं। नई किताब में जहां वैदिक काल में महिलाओं को मिले अधिकारों का जिक्र किया गया है। वहीं पुराने ग्रंथ मनुस्मृति के एक श्लोक का हवाला भी दिया गया है।

सिलेबस में हुए इस बदलाव को लेकर लोगों के बीच और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। किताब के मुताबिक, वैदिक दौर के समाज में महिलाओं को पढ़ाई-लिखाई, पूजा-पाठ और समाज में पुरुषों के बराबर हक मिले हुए थे। इसके साथ ही, किताब में यह भी बताया गया है कि वक्त के साथ-साथ महिलाओं की इस स्थिति में काफी बदलाव और उतार-चढ़ाव आते रहे।

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पढ़ाई-लिखाई और शिक्षा से जुड़े जानकारों के बीच इस बदलाव को लेकर अलग-अलग राय है। जहां एक तरफ कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति के अच्छे पहलुओं को दिखाने का एक अच्छा तरीका मान रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों का कहना है कि इतिहास को नए तरीके से पेश करने की कोशिश की जा रही है, जो सही नहीं है। इसी वजह से इतिहास को दिखाने के इस तरीके पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

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वैदिक काल में महिलाओं के अधिकार और पढ़ाई-लिखाई

नौवीं क्लास की नई किताब के 'भारत और विश्व' नाम के चैप्टर में वैदिक काल के समाज के बारे में बताया गया है। इस चैप्टर के मुताबिक, उस समय लड़कियों और महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई पर कोई रोक नहीं थी। वे ऊंची शिक्षा पाने के लिए पूरी तरह आजाद थीं और समाज या धर्म से जुड़े बड़े फैसलों में भी उनकी राय ली जाती थी।

किताब में उन पढ़ी-लिखी और समझदार महिलाओं का भी जिक्र है जिन्होंने पुराने वैदिक ग्रंथों को लिखने में मदद की थी। वैदिक काल की इन बातों के जरिए स्कूली बच्चों को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि उस समय भारत के समाज में महिलाओं को बहुत सम्मान दिया जाता था और उन्हें अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने की भी पूरी आजादी थी।

हालांकि, किताब निष्पक्ष होकर यह सच भी सामने रखती है कि इतिहास में हर समय महिलाओं की हालत एक जैसी नहीं रही। समय के साथ-साथ समाज और राजनीति के माहौल बदले, जिससे घर के बाहर के कामों में महिलाओं का आना-जाना पहले से कम हो गया। इसके बाद भी उन्होंने समाज को आगे बढ़ाने में अपना पूरा योगदान दिया।

मनुस्मृति के श्लोक पर छिड़ी नई बहस

इस चैप्टर का सबसे चर्चित और नाजुक हिस्सा मनुस्मृति के एक मशहूर श्लोक 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' को शामिल करना है। किताब में इसका आसान मतलब समझाते हुए लिखा गया है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है। इस श्लोक के जरिए यह बताने की कोशिश की गई है कि पुराने समय में महिलाओं की कितनी इज्जत की जाती थी।

लेकिन इस बदलाव का विरोध करने वालों का कहना है कि मनुस्मृति के सिर्फ इस एक श्लोक को दिखाकर यह साबित नहीं किया जा सकता कि इस ग्रंथ में महिलाओं को पूरा न्याय मिला था। सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक, मनुस्मृति के दूसरे हिस्सों में महिलाओं और अलग-अलग वर्गों को लेकर जो सख्त नियम-कानून बताए गए हैं, उन्हें सिलेबस में छोड़ देना इतिहास को सिर्फ एकतरफा चश्मे से दिखाना होगा।

दूसरी तरफ, किताब को तैयार करने वाले जानकारों का कहना है कि वे किसी खास सोच को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं। उनका कहना है कि इस श्लोक को जोड़ने का मकसद सिर्फ बच्चों को पुरानी संस्कृति की अच्छी और प्रेरणा देने वाली बातों से रूबरू कराना है। उनके मुताबिक, बच्चों को अपनी संस्कृति की अच्छी बातों की जानकारी होनी ही चाहिए।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के हालिया विवाद से क्या है कनेक्शन?

NCERT की किताब में मनुस्मृति का यह मामला हाल ही में दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के लॉ फैकल्टी में हुए विवाद से भी जुड़ता है। कुछ समय पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी में कानून के छात्रों (LLB) के लिए मनुस्मृति को एक ऑप्शनल सब्जेक्ट (वैकल्पिक विषय) के रूप में पढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया था। उस समय छात्रों और शिक्षकों के संगठनों ने मिलकर इसका डटकर विरोध किया था।

विवाद बढ़ने पर दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। इसके बाद कानून की पढ़ाई से मनुस्मृति को जोड़ने की योजना पूरी तरह खत्म हो गई। लेकिन अब स्कूल की किताब में मनुस्मृति का हवाला मिलने के बाद देश के स्तर पर इस पर एक बार फिर नई बहस छिड़ने के आसार दिख रहे हैं

किताबों में बदलाव और पहले के विवाद

नौवीं क्लास की इस सामाजिक विज्ञान की किताब के कुछ पुराने चैप्टरों पर भी पहले हंगामा हो चुका है। इससे पहले चुनाव के तौर-तरीकों से जुड़े कुछ मुद्दों और स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर रेटिंग (SIR) के विषय पर लोगों ने आपत्तियां जताई थीं। किताबों में इस तरह के बदलाव हमेशा से चर्चा और विवाद का विषय रहे हैं।

किताबों में किसी भी तरह के बदलाव का मकसद हमेशा बच्चों को सही और निष्पक्ष जानकारी देना होना चाहिए। इस नई किताब में वैदिक काल से लेकर इतिहास के अलग-अलग समय में महिलाओं के अधिकारों में आए बदलावों को आसान और पूरे तरीके से समझाने की कोशिश की गई है, जो आने वाले दिनों में चर्चा का एक बड़ा मुद्दा बनी रहेगी।

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