जानिए गणेश चतुर्थी पर क्यों नहीं देखा जाता है चांद?
नई दिल्ली। भारतीय पौराणिक कहानियों में प्रथम पूज्य देव गणपति अपनी बुद्धि, शक्ति और लगन के साथ ही अपने भोजन प्रेम के लिए भी अति प्रसिद्ध हैं। अपनी काया के अनुरूप ही गणेश जी स्वादिष्ट भोजन भरपूर मात्रा में लेना पसंद करते हैं।
लड्डू और मोदक उनके प्रिय भोज्य पदार्थ माने जाते हैं। इसी भोजन के कारण गणपति के जीवन में एक ऐसी घटना घटी, जिसने चंद्रमा को श्रापित कर दिया।
गणपति जी के भोजन से कैसे चंद्रदेव का श्राप का भागी बनना संबद्ध हुआ, आइए जानते हैं
यह घटना गणेश चतुर्थी की रात की है। गणेश जी के जन्म की रात थी और उन्हें पेटभर कर अपने प्रिय व्यंजन लड्डू और मोदक खाने को मिले थे। प्रिय और स्वादिष्ट भोजन मात्रा से अधिक हो ही जाता है, सो गणपति भी खूब डटकर पेट पूजा कर चुके थे और भोजन पचाने के लिए अपने वाहन मूषकराज पर बैठ घूमने निकल पड़े थे। एक तो गणपति जी वैसे ही भारी थे, दूसरे, उस दिन डटकर भोजन करने के कारण वे और अधिक भारी मालूम पड़ रहे थे।
मूषकराज के फिसलने के साथ ही गणपति गिर गए
छोटे से मूषकराज ने अपनी भरपूर शक्ति लगाकर उन्हें साधे रखने का भरपूर प्रयत्न किया। थोड़ी देर बाद मूषकराज की शक्ति जवाब दे गई और उनका संतुलन बिगड़ गया। मूषकराज के फिसलने के साथ ही गणपति भी मैदान में धाराशायी हो गए।यहां तक तो सब ठीक था, गणपति को गिरते हुए किसी ने नहीं देखा था, पर चतुर्थी का चांद आकाश में चमक रहा था। इतने बड़े पेट के साथ गणपति को चारों खाने चित्त होते देख चंद्रमा अपनी हंसी नहीं रोक पाए और ठहाका मारकर हंस पड़े।
चंद्रमा की हंसी ने आग में घी का काम किया
गणपति वैसे ही गिरने से लज्जित और कु्रद्ध थे, तिस पर चंद्रमा की हंसी ने आग में घी का काम किया। गणपति जी क्रोध में भरकर उठे और तुरंत ही चंद्रमा को श्राप दे दिया कि जो व्यक्ति चतुर्थी के चांद के दर्शन करेगा, वह अपयश का भागी होगा।













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