जानिए कार्तिक माह की दोनों एकादशियों पर क्यों होती है 'शालिग्राम' की पूजा?

नई दिल्ली। कार्तिक मास भगवान विष्णु का परमप्रिय मास होता है। इस पूरे माह भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का पूजन कर उन्हें प्रसन्न किया जाता है। इस माह में आने वाली दोनों एकादशियों का भी अपना विशेष महत्व होता है। कार्तिक कृष्ण एकादशी को रमा एकादशी और कार्तिक शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है।इन दोनों एकादशियों पर जिस प्रकार भगवान विष्णु की पूजा की जाती है, वैसे ही शालिग्राम का पूजन करने का भी खास महत्व होता है। इन दोनों एकादशियों की पूजा में शालिग्राम का होना अत्यंत आवश्यक बताया गया है। देव उठनी एकादशी के दिन तो तुलसी और शालिग्राम का विवाह भी करवाया जाता है। इस बार रमा एकादशी 11 नवंबर को और देव प्रबोधिनी एकादशी 25 नवंबर को आ रही है।

कार्तिक की दोनों एकादशियों पर होती है शालिग्राम की पूजा

क्या है शालिग्राम

जिस तरह भगवान शिव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है वैसे ही भगवान विष्णु को शालिग्राम के रूप में पूजा जाता है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार वृंदा नामक सती स्त्री ने अपने पति जलंधर और अन्य कथा के अनुसार शंखचूड़ को विष्णु जी द्वारा छलपूर्वक मार दिए जाने पर यह श्राप दिया था कि तुमने मेरा सतीत्व भंग किया है। अतः तुम पत्थर के बन जाओगे। यह पत्थर शालिग्राम कहलाया। तब भगवान विष्णु ने कहा, 'हे वृंदा! यह तुम्हारे सतीत्व का फल है कि तुम तुलसी का पौधा और गंडकी नदी बनकर सदा मेरे साथ ही रहोगी। मैं यहीं गंडकी नदी के किनारे तुम्हारे साथ रहूंगा। जो मनुष्य एकादशी के दिन तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा और द्वादशी के दिन शालिग्राम से विवाह करेगा वह परम धाम को प्राप्त होता है।

शिव और विष्णु दोनों ने ही पार्थिव रूप धारण किया

शालिग्राम श्री नारायण का साक्षात् और स्वयंभू स्वरूप माना जाता है। आश्चर्य की बात है की त्रिदेव में से भगवान शिव और विष्णु दोनों ने ही जगत के कल्याण के लिए पार्थिव रूप धारण किया। जिस प्रकार नर्मदा नदी में निकलने वाले पत्थर नर्मदेश्वर या बाण लिंग साक्षात् शिव स्वरूप माने जाते हैं और स्वयंभू होने के कारण उनकी किसी प्रकार प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। ठीक उसी प्रकार शालिग्राम भी नेपाल में गंडकी नदी के तल में पाए जाने वाले काले रंग के चिकने, अंडाकार पत्थर होते हैं। स्वयंभू होने के कारण इनकी भी प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। इन्हें घर अथवा मंदिर में सीधे ही पूज सकते हैं।

कैसा होता है स्वरूप

शालिग्राम अनेक प्रकारों और रूपों में प्राप्त होते हैं। कुछ मात्र अंडाकार होते हैं तो कुछ में एक छिद्र होता है तथा पत्थर के अंदर प्राकृतिक रूप से शंख, चक्र, गदा या पद्म अंकित होते हैं। कुछ पत्थरों पर चक्र के समान दिखाई देने वाली सफेद रंग की गोल धारियां होती हैं। कभी-कभी यह पीत आभा युक्त भी प्राप्त होते हैं, लेकिन ये अत्यंत दुर्लभ होते हैं। खोजकर्ताओं और संकलनकर्ताओं ने इनके विभिन्न रूपों का अध्ययन कर इनकी संख्या 80 से लेकर 124 तक बताई है। शालिग्राम एक विलक्षण और मूल्यवान पत्थर होता है। मान्यता है कि इसके भीतर अल्प मात्रा में स्वर्ण होता है। जिसे विशेष पद्धतियों द्वारा निकाला जाता है, इसलिए चोर इन्हें चुरा लेते हैं।

एकादशी और अन्य दिनों में शालिग्राम पूजा के लाभ

  • सबसे पहली बात तो यह कि शालिग्राम अत्यंत ऊर्जावान और शक्तिशाली होता है। इसके लिए अत्यंत पवित्र वातावरण चाहिए। यदि आप घर में शालिग्राम स्थापित कर रहे हैं तो घर को मंदिर की तरह शुद्ध और पवित्र रखना होगा।
  • शालिग्राम का पूजन तुलसी के बिना पूर्ण नहीं होता। यदि घर में शालिग्राम है तो उसकी नित्य पूजा में तुलसी अवश्य अर्पित करें।
  • दैनिक पूजन में शालिग्राम को स्नान कराकर चंदन लगाकर तुलसी दल अर्पित करना और चरणामृत ग्रहण करना चाहिए। यह उपाय मन, धन व तन की सारी कमजोरियों व दोषों को दूर करता है।
  • देव प्रबोधिनी एकादशी पर शालिग्राम और तुलसी का विवाह करने से सारे अभाव, कलह, पाप, दुःख और रोग दूर हो जाते हैं। तुलसी शालिग्राम विवाह करवाने से कन्यादान करने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
  • पुराणों के अनुसार नित्य शालिग्राम का दर्शन व पूजन से समस्त भोग प्राप्त होते हैं।
  • भगवान शिव ने स्कंदपुराण के कार्तिक माहात्मय में भगवान शालिग्राम की स्तुति की है।
  • ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड अध्याय में उल्लेख है कि जहां शालिग्राम की पूजा होती है और विशेषकर समस्त एकादशियों पर, वहां भगवान विष्णु के साथ भगवती लक्ष्मी भी निवास करती है।
  • शालिग्राम शिला का जल अपने ऊपर छिड़कने पर समस्त यज्ञों और संपूर्ण तीर्थों में स्नान करने के समान फल मिलता है।
  • निरंतर शालिग्राम शिला का जल से अभिषेक करने वाला मनुष्य पृथ्वी की प्रदक्षिणा के उत्तम फल का अधिकारी बन जाता है।
  • मृत्युकाल में शालिग्राम शिला के चरणामृत का जलपान करने वाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक चला जाता है।
  • जिस घर में शालिग्राम का नित्य पूजन होता है उसमें वास्तु दोष और बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती है।
  • पुराणों में उल्लेख है कि शालिग्राम का तुलसीदल युक्त चरणामृत पीने से भयंकर से भयंकर विष का भी तुरंत नाश हो जाता है।
  • एकादशी के दिन शालिग्राम को गंगाजल अर्पित कर तुलसी दल भेंट करने से समस्त सुख, भोग, ऐश्वर्य, वैभव प्राप्त होता है।
  • शालिग्राम का नित्य पूजन स्पर्श करने से युवतियों को योग्य और श्रेष्ठ वर की प्राप्ति होती है।
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