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Kundali: जानिए कुंडली के 12वें भाव के लाभ और हानि को

By Pt. Anuj K Shukla
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लखनऊ। कुण्डली में बारह भाव होते है। इन भावों से जातक के सम्पूर्ण जीवन का विचार किया जाता है। प्रत्येक भाव के कारक ग्रह है, जो अपनी शुभता व अशुभता के आधार पर भावों को मजबूत व कमजोर करते है। भावों में बैठों ग्रहों व उन भावों पर पड़ने वाले ग्रहों की दृष्टियों के आधार पर भाव फल कथन किया जाता है। आईये आज बात करते है-भाव फल विचार करने के लिए कुछ आवश्य नियम। किसी भाव का फल जानने के लिए इन 8 नियमों को जानना आवश्यक है।

 कौन कौन शुभ या पाप ग्रहों की दृष्टि

कौन कौन शुभ या पाप ग्रहों की दृष्टि

  • ग्रह शुभ है या पाप ग्रह।
  • उस भाव का स्वामी कौन है।
  • भाव-स्वामी पाप ग्रह या शुभ है।
  • उस भाव पर कौन कौन शुभ या पाप ग्रहों की दृष्टि है।
  • उस भाव का स्वामी और उस भाव में स्थित ग्रह इन दोनों की मैत्री।
  • उस भाव में स्थित ग्रह उच्चबल या निर्बल का है।
  • वह अपने घर में है या मूल त्रिकोण में है।
  • उस ग्रह के गुण धर्म क्या है।
  • इत्यादि बातों का विचार करने के बाद ग्रह का फल करना चाहिए।

ग्रहों का शुभत्व, पापग्रह, स्वगृह या भाव स्वामी विचार ग्रहों की उच्च, नीच, मूल त्रिकोण राशिया, ग्रहों की मैत्री, ग्रहों की दृष्टि, ग्रहों के गुण धर्म आदि आवश्यक बातें जरूर समझना चाहिए।

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ग्रहों का शुभाशुभत्व विचार

ग्रहों का शुभाशुभत्व विचार

  • ग्रहों का शुभत्व 3 प्रकार का होता है। 1-शुभ ग्रह। 2-पाप ग्रह या क्रूर ग्रह। 3-मिश्र ग्रह।
  • शुभ ग्रह-गुरू और शुक्र सदैव शुभ ग्रह समझे जाते है।
  • पाप ग्रह-रवि, मंगल, शनि, राहु, केतु। ये अशुभ ग्रह है, इस कारण इनको पाप या क्रूर ग्रह कहते है। ये सदैव पाप ग्रह ही समझे जाते है।
  • मिश्र ग्रह-बुध और चन्द्र ये संयोगवश कभी पाप ग्रह कभी शुभ ग्रह समझे जाते है, इस कारण इनको मिश्र ग्रह कहते है। वास्तव में ये दोनों शुभ ग्रह ही है, किन्तु जब ये पाप ग्रह के साथ होते है तो पाप ग्रह और अकेले या शुभ ग्रह के साथ रहते है तो शुभ ग्रह कहलाते है।
  • ग्रहों का स्थान या स्वगृह-
  • यद्यपि ग्रह सूर्य के आस-पास घूमते है, किन्तु सुविधा के लिए पृथ्वी के आस-पास आकाश में चन्द्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरू, शनि क्रमानुसार घूमते हुये मान लिए गए है।इन ग्रहों में सूर्य और चन्द्रमा का एक-एक निजी घर है और ग्रहों के 2-2 घर राशि चक्र में हैं। इन ग्रहों का स्वगृह कहते है। कौन-कौन राशि किस प्रकार किस ग्रह के अधिकार में आते है।पृथ्वी के सबसे अधिक चन्द्र है, इसका सीधा प्रभाव हमारे मन व ह्रदय पर पड़ता है।ह्रदय का द्योतक राशि कर्क है, इस कारण चन्द्र का स्वस्थान कर्क राशि मानी गई है।
चन्द्र के आगे सबसे शक्तिशाली ग्रह सूर्य है

चन्द्र के आगे सबसे शक्तिशाली ग्रह सूर्य है

  • चन्द्र के आगे सबसे शक्तिशाली ग्रह सूर्य है। सूर्य का प्रभाव आत्मा पर पड़ता है और सिंह राशि आत्मा की सूचक है, इस कारण सिंह राशि सूर्य का स्वस्थान माना गया है। सूर्य के पास बुध है इस कारण उनके दोनों बाजुओं की राशि मिथुन और कन्या इन दोनों का स्वामी बुध हुआ अर्थात बुध को ये 2 घर मिले है।
  • बुध के उपरान्त शुक्र ग्रह है, इसे दोनों ओर की दो राशियाॅ वृष और तुला मिली, इस कारण शुक्र इन दो राशियों का स्वामी हुआ। शुक्र के आगे मंगल है, इसे आगे के की दो राशियाॅ मेष और वृश्चिक मिली। इस प्रकार इन दो राशियों का स्वामी मंगल हुआ। इसके बाद गुरू है उसे आगे की दो राशियाॅ मीन और धनु मिली, इस प्रकार गुरू इन दो राशियों का स्वामी हुआ।
  • गुरू के आगे आकाश में छोर पर शनि है, इसे आजु-बाजू की शेष 2 राशियाॅ कुंभ और कमर मिली। इस प्रकार ये राशियाॅ, इन ग्रहों के स्वस्थान हुए और इन्हीं स्थानों के स्वामी ये ग्रह हुए। स्वग्रह को स्वक्षेत्र भी कहते है। जो ग्रह अपने स्थान में होता है वह स्वगृही या स्वक्षेत्री कहलाता है।

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English summary
Read Important Facts about Twelve Houses or Bhavas in Kundali.
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