Sawan 2020: चौसर की हार- जीत और श्रापों का सिलसिला

नई दिल्ली। सावन का महीना हो और शिव परिवार की बात चले, तो आनंद दोगुना हो जाता है। भारतीय धार्मिक परंपरा के अनुसार सावन मास शिव की भक्ति में डूब जाने का समय माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु के निद्रा में चले जाने के बाद चातुर्मास में सृष्टि की सुरक्षा का दायित्व शिव परिवार पर रहता है। पुराणों में उल्लिखित है कि शिव परिवार भारतीय गृहस्थ की भांति जीवन का आनंद लेता है। वहां दांपत्य की नोंक-झोंक और मीठी तकरार के साथ मनुहार भी है, तो संतानों के निश्छल प्रेम की मधुरता भी है। वास्तव में शिव परिवार अपने भक्तों को जीवन के हर पल का आनंद लेना सिखाने के लिए ही समस्त सांसारिक व्यवहार की माया रचता है।

आज ऐसी ही कथा का रस लेते हैं, जिसमें जीवन के ये सभी रंग देखने को मिलते हैं...

भगवान शिव और देवी पार्वती चौसर खेलने बैठे

भगवान शिव और देवी पार्वती चौसर खेलने बैठे

एक बार की बात है। भगवान शिव और देवी पार्वती चौसर खेलने बैठे। उस दिन भाग्य ने देवी पार्वती का साथ दिया और वे शिव जी से हर र्चीज जीत गईं। हार से नाराज होकर शिव जी रूठ कर चले गए। यह बात उनके पुत्र कार्तिकेय को पता चली, तो वे मां के साथ चौसर खेलने बैठे और पिताजी का सब सामान जीत कर उन्हें देने चले गए। इससे पार्वती अत्यंत दुखी हुई कि सामान भी गया और शिव भी रूठ गए। पार्वती के लाड़ले पुत्र गणेश से मंा की दुखी दशा सहन नहीं हुई उन्होंने भाई के साथ चौसर खेलकर सब सामान वापस जीत लिया। गणेश जी सब सामान लेकर मां के पास पहुंचे, तो पार्वती उनसे रूष्ट हो र्गईं। उन्होंने गणेश जी को समझाया कि तुझे सामान नहीं, पिताजी को लेकर आना था। मां के मन की बात समझकर गणेश शिव जी को ढूंढने चले।

विष्णु जी ने पांसे का रूप धरा

विष्णु जी ने पांसे का रूप धरा

इस बीच पार्वती से रूठे शिव पुत्र कार्तिकेय को लेकर हरिद्वार जा पहुंचे थे। वहां शिव जी ने अपने मित्र विष्णु जी को समस्त घटनाक्रम सुनाकर कहा कि पार्वती को हराने के लिए आप पांसा बन जाइए और मुझे जिता दीजिए। विष्णु जी ने पांसे का रूप धरा, इतने में गणेश वहां आ कर शिव जी से घर चलने का आग्रह करने लगे। एक बार फिर चौसर खेलने की शर्त पर शिव जी घर आ गए। घटना का आनंद लेने नारद जी भी साथ चल पड़े। सारी बात सुनकर पार्वती हंसकर बोलीं कि चौसर पर दांव लगाने के लिए आपके पास तो कुछ है ही नहीं। इस पर नारद जी ने अपनी वीणा शिव को दे दी। खेल प्रारंभ हुआ और पार्वती हारती चलीं गईं, लेकिन गणेश जी समझ गए और उन्होंने मां को बता दिया कि विष्णु जी पांसा बने हुए हैं।

अब पार्वती अत्यंत क्रोधित हुईं...

अब पार्वती अत्यंत क्रोधित हुईं...

अब पार्वती अत्यंत क्रोधित हुईं और उन्होंने सबको श्राप दे दिया। उन्होंने नारद जी को श्राप दिया कि तुम छल में साथ देने रूके थे, तो अब तुम कहीं भी एक स्थान पर ना रूक सकोगे, तुम भटकते ही रहोगे। इसके बाद से नारद विचरण ही कर रहे हैं। शिव जी से पार्वती बोलीं कि आपने एक स्त्री के साथ छल किया, तो अब आपको जीवन पर्यंत एक स्त्री का बोझ अपने सिर पर ढोना पड़ेगा। इस कारण ही शिव की जटाओं में गंगा को स्थान मिला।

कार्तिकेय आज भी बालरूप में ही पूजे जाते हैं

कार्तिकेय आज भी बालरूप में ही पूजे जाते हैं

विष्णु जी से मां पार्वती ने कहा कि आप पति- पत्नी का मेल कराने के बजाय उन्हें दूर कर रहे थे, तो अब आप मानव रूप लेंगे और रावण आपकी पत्नी का हरण करेगा। आप अपनी पत्नी का विछोह सहेंगे। श्री विष्णु के राम अवतार की कथा सब जानते ही हैं। कार्तिकेय भी मां के क्रोध से बच ना सके। पार्वती ने कहा कि संतान होकर भी तुमने माता- पिता के बीच झगड़ा बढ़ाने का बचपना किया, सो अब तुम आजन्म बालरूप में ही रहोगे। कार्तिकेय सर्वत्र आज भी बालरूप में ही पूजे जाते हैं।

शिक्षा

तो दोस्तों, यह है शिव परिवार की महिमा, जो पारिवारिक प्रेम और द्वंद्व के बीच जीवन के कई मूल्यों का पाठ पढ़ाती जाती है। तो आप आनंद भी लें और सीख भी।

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