उत्तर प्रदेश में पंचायत व्यवस्था को लेकर बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। एक तरफ राज्य सरकार ने 2021 में चुनी गई जिला पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने के बाद नई व्यवस्था लागू कर दी है। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक बनाने का फैसला लिया है।
दूसरी तरफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने पर सरकार से जवाब मांग लिया है। अदालत ने साफ पूछा है कि क्या किसी निर्वाचित प्रतिनिधि का कार्यकाल खत्म होने के बाद उसे प्रशासक बनाना संविधान की अनुरूप है या फिर यह पीछे के रास्ते से कार्यकाल बढ़ाने जैसा कदम है।
पंचायती राज अनुभाग-2 की ओर से 10 जुलाई 2026 को जारी आदेश में कहा गया कि साल 2021 में गठित जिला पंचायतों का कार्यकाल 11 जुलाई 2026 को पूरा हो गया है। नई जिला पंचायतों के गठन तक प्रशासनिक कामकाज रुकने न पाए, इसलिए प्रशासक नियुक्त किए जाएंगे। आदेश में उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत अधिनियम, 1961 की धारा-20 और धारा-21 का हवाला देते हुए कहा गया है कि जिला पंचायत का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। इसके साथ ही अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल भी समाप्त माना जाएगा। सरकार ने साफ किया है कि 12 जुलाई 2026 से नई जिला पंचायतों के गठन या अधिकतम छह महीने तक, जो भी पहले हो, सामान्य प्रशासनिक कामकाज जारी रहेगा। रूटीन फैसले लिए जाएंगे जबकि किसी बड़े या नीतिगत निर्णय के लिए प्रस्ताव जिलाधिकारी के जरिए शासन को भेजा जाएगा। इस फैसले का मकसद विकास कार्यों को रुकने से बचाना बताया गया है ताकि पंचायतों का रोजमर्रा का काम प्रभावित न हो। इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ग्राम पंचायतों के मामले में सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने पूछा कि जब ग्राम प्रधान का कार्यकाल खत्म हो चुका है, तो उसी व्यक्ति को प्रशासक बनाकर पंचायत चलाने का कानूनी आधार क्या है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि विचार करने वाली बात यह है कि क्या यह व्यवस्था अप्रत्यक्ष रूप से कार्यकाल बढ़ाने जैसी नहीं है। अगर ऐसा है, तो फिर संविधान में तय नियमित चुनाव और लोकतांत्रिक व्यवस्था का क्या होगा। यह मामला संजय कुमार शर्मा की जनहित याचिका पर सामने आया। याचिका में कहा गया कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद उसी निर्वाचित ग्राम प्रधान को प्रशासक बनाना संविधान की भावना के खिलाफ हो सकता है। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि वर्ष 2000 में प्रेमलाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में हाईकोर्ट इसी तरह के प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के के विपरीत मान चुका है। अदालत ने पूछा कि अगर पुराने ग्राम प्रधान ही प्रशासक बने रहेंगे, तो क्या इससे राज्य निर्वाचन आयोग की संवैधानिक भूमिका कमजोर नहीं होगी। पंचायत चुनाव समय पर कराना आयोग की जिम्मेदारी है, ऐसे में सरकार की यह व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कैसे प्रभावित नहीं करेगी, इसका जवाब भी मांगा गया है। बेंच ने पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है। साथ ही इस मामले को पंचायत व्यवस्था से जुड़ी अन्य लंबित जनहित याचिकाओं के साथ जोड़कर सुनवाई करने का फैसला लिया गया है।सरकार का नया आदेश क्या कहता है?
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