भोजपुरी गीतों से अंग्रेजों को ललकारने वाले 103 साल के जंग बहादुर सिंह को मिला लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड
देश की आजादी की लड़ाई के समय देश भक्ति के गाने सुनकर अंग्रेज भयभीत हो जाते थे और स्वतंत्रता सेनानियों में नया जोश जाग उठता था, उन्हीं लोक गायक जंग बहादुर सिंह को 103 साल की उम्र में 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड ' से नवाज़ा गया है। लोक गायक जंग बहादुर सिंह को भोजपुरी लोकगायिकी के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए साहित्यिक-सांस्कृतिक महोत्सव-6 में सम्मानित किया गया है।

भोजपुरी के धाम अमही मिश्र, भोरे, गोपालगंज, बिहार में जय भोजपुरी-जय भोजपुरिया द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जब 103 वर्षीय जंग बहादुर जब स्टेज पर अपना सम्मान लेने पहुंचे तो पूरा महोत्सव तालियों की गड़गड़ाह से गूंज उठा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जंग बहादुर को ये सम्मान मशहूर लोक गायक मुन्ना सिंह व्यास, भरत शर्मा व्यास व संस्था के अध्यक्ष सतीश त्रिपाठी द्वारा सौंपा गया।
बिहार के सिवान जिले के रघुनाथपुर के कौसड़ गांव के रहने वाले लोकगायक जंग बहादुर सिंह का जन्म 10 दिसंबर 1920 में हुआ। व्यास शैली के लोकगायक जंग बहादुर बिहार, बंगाल, यूपी और झारखंड में 60 के दशक के जाने माने भोजपुरी लोकगायक थे लेकिन इसके बाद 2022 तक जंग बहादुर सिंह गुमनानी की जिंदगी बिता रहे थे। जबकि ये वो जंग बहादुर सिंह थे जिनकी आवाज में वृद्धावस्था में भी वो ही हनक थी जैसी स्वतंत्रता संग्राम के समय थी जिसे सुनकर अंग्रेज थरथर कांप उठते थे।
हालांकि आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर मनाए जा रहे 'अमृत महोत्सव' के दौरान जंग बहादुर सिंह की गुमनानी की जिंदगी के बारे में मीडिया में खबरें आने के बाद लोगों को इस महान लोकगायक के बारे में पता चला।
साहित्यकार मनोज भावुक ने बताया जंग बहादुर सिंह आजादी के पहले अपने क्रांतिकारी भोजपुरी गीतों से अंग्रेजों को ललकारते रहे। भोजपुरी देशभक्ति गीत गाने की वजह से अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया था। आसनसोल, झरिया, धनबाद और पूरे बिहार-यूपी में तीन दशक तक जंग बहादुर सिंह की गायिकी का डंका बजता रहा। भैरवी गायन में तो उनके सामने कोई टिकता ही नहीं था। जभो जभो ने भोजपुरी संगीत के इस कोहिनूर को सम्मानित कर कार्यक्रम को ऐतिहासिक बना दिया।












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