38 साल पहले छिनी सरकारी नौकरी, Saviour बनकर उभरे नेकराम शर्मा, हजारों किसानों के साथ से स्वदेशी आंदोलन
Farmers Indigenous Seed Use की दिशा में Nekram Sharma ने सराहनीय काम किया है। हिमाचल का ये किसान Saviour के रूप में पॉपुलर हो रहा है। nekram sharma Nau-anaj farming Farmers Indigenous Seed Use Mandi himachal pradesh
Farmers Indigenous Seed Use करें, इस मिशन पर नेकराम शर्मा पिछले कई साल से जुटे हैं। Nekram Sharma के सराहनीय काम का अंदाजा इसी बात से होता है कि उन्होंने अब हजारों से अधिक किसानों का नेटवर्क जैसा कर लिया है जो जो स्वदेशी बीजों को संरक्षित करने में उनकी मदद करते हैं। पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में रहने वाले नेकराम शर्मा की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि करीब 38 साल पहले मिली नाकामी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार एक ऐसे मिशन में जुट गए जो अब किसी आंदोलन से कम नहीं। नेकराम शर्मा हजारों किसानों के साथ मिलकर स्वदेशी बीजों का संरक्षण कर रहे हैं। (सभी तस्वीरें साभार फेसबुक @nekram.sharma.710)

Effort Never Dies
हिमाचल प्रदेश के करसोग घाटी में नानज गांव के किसान नेकराम शर्मा भले ही खुद को मामूली या छोटे किसान मानते हों लेकिन उन्हें जीवन में सबसे खास मौका उस समय मिला जब उन्हें 1984 में सरकारी नौकरी में नहीं चुना गया। रिजेक्शन को END न मानने का एटिट्यूड नेकराम को खास बनाता है। कहना गलत नहीं होगा कि नेकराम ने भारत रत्न डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का कथन चरितार्थ कर दिखाया जिसमें उन्होंने कहा था, END के सही मायने अंत नहीं, बल्कि Effort Never Dies होता है।

सब्जियां उगाने के साथ-साथ जैविक खेती
अपने परिवार की 22 बीघा अनुपयोगी भूमि पर उन्होंने खेती शुरू की। नेकराम ने अपने खेत में प्राचीन कृषि तकनीकों को अपनाया और फल, सब्जियां उगाने के साथ-साथ जैविक खेती का प्रयोग शुरू कर दिया। वैकल्पिक करियर के रूप में हुई शुरुआत नेकराम का पूर्णकालिक व्यवसाय बन गया। उन्होंने लगभग तीन दर्जन देशी किस्मों के बीजों का संरक्षण किया।

खेती-किसानी से प्यार और स्वदेशी बीजों के Saviour
नेकराम के एफर्ट के साथ जब स्थानीय ग्रामीणों का सहयोग जुड़ा तो स्वदेशी बीजों का संरक्षण प्रयास से आगे बढ़कर आंदोलन बनकर उभरा। नेकराम को खेती-किसानी से प्यार और स्वदेशी बीजों के Saviour यानी 'उद्धार करने वाले' की पहचान मिली। नेकराम ने नौ-अनाज (Nau-anaj) फॉर्मूला अपनाया है। इसका मतलब बताते हुए उन्होंने कहा, Nau का मतलब 9 और अनाज का मतलब फसल है। ये एक अंतर-फसल पद्धति (intercropping method) है, जिसमें एक ही भूमि के टुकड़े पर नौ खाद्यान्न उगाए जाते हैं।

एक ही खेत में नौ किस्म के बीज
Nau-anaj पद्धति के तहत खेती करने के दौरान जिन फसलों की रोपाई होती है उनमें दाल, अनाज, सब्जियां, फलियां और लता वाली फसलों का संयोजन होता है। नेकराम फसलें उगाने के लिए जिन स्वदेशी बीजों का इस्तेमाल करते हैं ये उन्हें अपने से बड़ी उम्र वाले किसानों से या बीजों का संरक्षण करने वाले स्थानीय लोगों से मिलते हैं।

एक साल में 18 फसलें
नेकराम फॉक्सटेल बाजरा, मक्का, फिंगर बाजरा, एक प्रकार का अनाज, ऐमारैंथस राजमा, उड़द की दाल, मूंग और बीन्स की खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि Nau-anaj फॉर्मूले पर एक साल में 18 फसलें (9 खरीफ) और (9 रबी) उगाई जा सकती हैं। इस फसल पैटर्न के कई फायदे हैं क्योंकि इससे जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है। शून्य इनपुट लागत के साथ इस पद्धति की खेती में कम पानी की भी खपत होती है।

2002 के बाद से इंटरक्रॉपिंग सिस्टम
करीब 20 साल से स्वदेशी बीजों और खेती की पारंपरिक शैली को संरक्षित करने पर काम कर रहे नेकराम शर्मा आने वाली पीढ़ियों के लिए सभी स्थानीय किस्मों के स्वदेशी बीजों का उत्पादन करने में भी कामयाब रहे हैं। उन्होंने बताया कि साल 2002 के बाद से उन्होंने न केवल इंटरक्रॉपिंग सिस्टम को बढ़ावा दिया है, बल्कि आठ प्रकार के बाजरा, गेहूं की तीन किस्मों सहित लगभग 20 स्वदेशी बीजों को बचाया है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने बताया कि जब वे 25 साल के थे, उस समय जंगलों को बचाने के लिए एक जन आंदोलन शुरू हुआ था।

स्वदेशी बीजों से अधिक पोषण
नेकराम शर्मा बताते हैं कि उनके पूर्वजों और बड़ी उम्र के किसानों को इस बात का अफसोस रहा कि देशी बीज धीरे-धीरे बाजार से गायब हो रहे हैं। ऐसे समय में वे सोचने पर मजबूर हो गए। बकौल नेकराम, उन्होंने कुछ शोध किया और महसूस किया कि स्वदेशी बीजों में जो उपलब्ध थे उससे अधिक पोषण मिल रहा था। कुछ स्थानीय किसान इन बीजों का उपयोग भी कर रहे थे। ऐसे में उन्होंने इन देशी बीजों को अपने खेतों में इकट्ठा करना और बुआई शुरू कर दी।

स्वदेशी बीज से पारंपरिक खेती का कारवां
59 वर्षीय नेकराम बताते हैं कि शुरुआत में स्वदेशी बीजों के संरक्षण की बात सुनकर किसानों ने उन्हें पागल कहा। पेड़ों और देशी बीजों को बचाने की कोशिशों को लेकर उन्हें ताने भी मारे गए, लेकिन कुछ दोस्तों का समर्थन मिला और स्वदेशी बीज से पारंपरिक खेती का कारवां चल पड़ा। अपने दोस्तों के समर्थन से नेकराम ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार हासिल की और स्वदेशी बीजों का पुनरुद्धार करने के साथ-साथ इनके स्वास्थ्य लाभ से लोगों को परिचित कराने के लिए विशेषज्ञों से संपर्क किया।

खुद का स्वदेशी बीज बैंक बनाया
अपने आंदोलन के तरीकों के बारे में किसान नेकराम बताते हैं कि किसानों को स्वदेशी बीजों की वैल्यू और उसके फायदों को समझाने के लिए कई पंचायत बैठकें की गईं। करीब 20 साल से अपनी मुहिम में जुटे नेकराम के पास अब खुद का स्वदेशी बीज बैंक भी है। इसके माध्यम से बीजों के संरक्षण और के साथ-साथ नेकराम किसानों के बीच बीजों का वितरण भी करते हैं। है। नेकराम का कहना है कि वह किसानों से संकर बीजों के साथ-साथ पारंपरिक बीज उगाने का अनुरोध करते हैं। उन्होंने बताया कि वे पारंपरिक बीज की बुआई करने वाले अकेले किसान नहीं बनना चाहते, इसे बड़े पैमाने पर फैलाना चाहते हैं।

कई राज्यों के हजारों किसानों ने थामा हाथ
करीब 12 साल पहले हिमाचल के किसान नेकराम ने Nau-Anaj पद्धति के साथ खेती शुरू की। 2010 में उन्होंने नौ-अनाज प्रथा लागू की और हिमाचल के अन्य किसानों को भी इंटर क्रॉपिंग यानी एक ही खेत में नौ अलग-अलग फसलों की एक साथ रोपाई के लिए प्रेरित किया। इसी की अगली कड़ी में किसानों का एक सहकारी समूह Parvatiye Tikau Kheti Abhiyan (PTKA) का गठन किया गया। इस अभियान का नतीजा रहा कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गाजियाबाद, राजस्थान, गुजरात और यहां तक कि हैदराबाद के हजारों किसानों ने भी स्वदेशी बीजों के संरक्षण के लिए नेकराम के साथ हाथ मिलाया। किसान उनके साथ जुड़े हैं। आमतौर पर किसान हिमाचल जाकर नेकराम से स्वदेशी बीज लेते हैं, जो उसके पास बीज लेने के लिए आते हैं, लेकिन जो नहीं कर सकते, वे उनसे एक कूरियर के लिए अनुरोध करते हैं, जिसे वह सहर्ष स्वीकार करते हैं।
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