Diwali 2020: दिवाली पर लक्ष्मी का पूजन गणेश जी के साथ क्यों होता है?
Diwali 2020: धार्मिक आयोजनों का प्रारंभ सदा गणपति पूजा के साथ होता है, यह हिंदु धर्म की परंपरा है। हमारे यहां गणपति प्रथम पूज्य देव माने गए हैं, उन्हें विघ्नहर्ता का नाम मिला है। यह माना जाता है कि गणपति के स्मरण के साथ प्रारंभ किया गया हर काम निर्विघ्न संपन्न हो जाता है। इस संबंध में कथा भी प्रचलित है कि कैसे गणपति ने भगवान शिव और मां पार्वती की परिक्रमा द्वारा उन्हें प्रसन्न कर प्रथम पूज्य देव का स्थान पाया था।

लेकिन एक विचित्र संयोग यह मिलता है कि दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा गणेश जी के साथ की जाती है। यहां गणपति मां लक्ष्मी के पहले नहीं, बल्कि उनके साथ एक आसन पर बिठाकर पूजे जाते हैं। सर्वविदित है कि मां लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं, पर दीपावली के पूजन में उनके साथ विराजने का अधिकार श्री गणेश को मिला है।
आखिर क्यों आज यही जानते हैं
सर्वविदित है कि समुद्रमंथन के समय अनेक अमूल्य संपत्तियों के साथ धन की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी का भी प्राकट्य हुआ था। ठीक उसी समय प्रभु विष्णु के साथ उनका विवाह भी संपन्न कराया गया था इसका कारण यह था कि स्वयं देवी लक्ष्मी ने श्री विष्णु का वरण किया था। इसके अलावा श्री विष्णु संसार के पालक भी हैं, तो स्वाभाविक रूप से धन की व्यवस्था उनके हाथ में ही रहने से सबका पालन. पोषण सुचारू रूप से चल सकता है।
देवी लक्ष्मी स्वभाव से चंचला थीं
यहां तक तो सब काम व्यवस्थित रूप से चल रहा था, लेकिन देवी लक्ष्मी स्वभाव से चंचला थीं। वे किसी के वश में नहीं थीं। वे सरल हृदया थीं आैर मानिनी भी। जो भी उनका स्मरण और तप करता, वे बिना सोचे. विचारे उस पर कृपालु हो जातीं। वो जिससे रूष्ट हो जातीं, उसे बिना कारण जाने दरिद्र बना देतीं। तब उनकी कृपा से जो अयोग्य प्रचुर धन पा लेता, वह अहंकारी हो जाता और दूसरों पर अत्याचार करने लगता था। श्री लक्ष्मी के इस चंचल स्वभाव से सृष्टि की व्यवस्था बिगड़ने लगी और आसुरी शक्तियां उन्हें प्रसन्न कर बलशाली बनने लगीं। तब देवत्रयी अर्थात् शिव, विष्णु और ब्रह्मा जी ने मिलकर इस समस्या का समाधान निकाला। तब बुद्धि के देवता गणपति को देवी लक्ष्मी का सखा बनाया गया।
मां लक्ष्मी धन की अधिष्ठात्री बनी रहीं
इस व्यवस्था के बाद देवी लक्ष्मी धन की अधिष्ठात्री बनी रहीं, पर उनके धन देने की निर्णय बुद्धि गणपति जी के अधीन हो गई। इस व्यवस्था के बाद देवी लक्ष्मी के चंचल स्वभाववश लिए गए निर्णय नियंत्रित होकर विवेकसम्मत हो गए। इस व्यवस्था से संसार को यह संदेश भी मिला कि धन महाशक्ति है, लेकिन विवेक के बिना यदि उसका उपयोग किया जाए, तो वह सर्जनात्मक ना होकर मारक हो सकता है। धन मंगलकारक भी हो सकता है आैर अमंगलकारक भी। धन अपार शक्ति प्रदान करता है, लेकिन उसका स्वरूप उसके उपयोग के तरीके पर निभर्र करता है। इस तरह धन आैर विवेक के संतुलन ने देवी लक्ष्मी और गणपति जी की पूजा एक साथ, एक ही दिन करने की परंपरा स्थापित की।
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