Tribute: खुशवंत सिंह का 100 वां जन्म दिन

नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। खुशवंत सिंह आज हमारे बीच होते तो 2 फरवरी को अपने जीवन के सौ वसंत देख लेते। नियति को यह मंजूर नहीं था। पर उन्होंने भरपूर जीवन जिया। उनके जाने के बाद सुजान सिंह पार्क यतीम हो गया। अब इधर उनके फ्लैट में दोस्तों की बैठकें नहीं होती। समय के बेहद पाबंद खुशवंत सिंहयारबाश थे। पर एक हद तक। शाम को आठ बजे के बाद वे सबको विदा कर देते थे। ड्राइंग रूम में आराम कुर्सी पर बैठकरवो दोस्तों से गप मारते थे। हंसी-ठिठोली के बीच भी उनके हाथ में कोई किताब रहती थी। दो दिन में एक किताब साफ।

Tribute to late Khushwant Singh on his 100th birthday

साठ का दशक

सुजान सिंह पार्क में वो साठ के दशक में आ गए थे। सुजान सिंह पार्क को उनके पिता सरदार सोबा सिंह ने अपने पिता के नाम से बनाया था। इंडिया गेट से बेहद करीब। इसे आप चाहें तो एक सोसायटी भी कह सकतेहैं। इसका बाहरी रंग ईंट वाला है। दो मंजिला इमारत है सुजान सिंह पार्क। राजधानी का पहला एपार्टमेंट्स। इसके ठीक आगे एक पत्थर लगा है। उसे आप पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि सरदार सोबा सिंह ने अपने पिता सुजान सिंह के नाम पर इसका निर्माण करवाया था। निर्माण वर्ष 1946 है।

सब जगह चाहने वाले

खुशवंत सिंह मूलत: और अंतत:अंग्रेजी के लेखक थे, पर उनके चाहने वालों का संसार तमाम भारतीय भाषाओं में है। राजधानी के एक अख़बार में काम करते हुए उनके कॉलम का सालों अनुवाद करने का मौका मिला। कई बार बात हुई। साक्षात और फोन पर। वे बातचीत के दौरान अपने पिता सरदार सोबा सिंह का जिक्र कर दिया करते थे। उन्होंने ही कनाटप्लेस और नई दिल्ली की कई महत्त्वपूर्ण इमारतों का निर्माण कराया था। इनमें मॉडर्न स्कूल, बड़ोदा हाऊस, राष्ट्रपति भवन वगैरह शामिल हैं। वे बताते थे उन्हें सुजान सिंह पार्क में रहना इसलिए पसंद है क्योंकि इधर सोबा सिंह का सारा कुनबा रहता रहा। खुशवंत सिंह ग्राउंडफ्लोर के फ्लैट में रहते थे।

एकाकी जीवन

कुछ बरस पहले पत्नी की मौत के बाद वे अपने फ्लैटमे एकाकी जीवन गुजार रहे थे। कुछ साल पहले से ही हरदिल इंसान खुशवंत सिह में पहले वाली जिंदादिली तो नहीं रही थी। उम्र का तकाजा था । जिस इंसान के देश-विदेश में करोड़ों चाहने वाले हों, वह एकदम अकेला हो, यकीन नहीं होता। उनके फ्लैट में प्रवेश करते ही आपको समझ आ जाता है कि ये आशियाना किसी शब्दों के शैदाई का होगा। अब भी चारों तरफ करीने से किताबें बुक शेल्फ में रखी हैं। पंजाब, पंजाबियत, उर्दू शायरी, राजनीति,समाज वगैरह विषयों पर सैकड़ों किताबें पढ़ी हैं। पर वे नहीं हैं। खुशवंत सिंह ने एक बार इस लेखक से कहा था कि वे इस बात की इजाजत नहीं देते कि कोई उनके घर से किताब लेकर जाए, पर वापस नहीं करें।

सबको याद आते खुशवंत सिंह

सुजान सिंह पार्क के ठीक आगे खान मार्केट हैं। यहां के दुकानदारों से खुशवंत सिंह का खासा लगाव था। दोनों एक दूसरे को बीते दशकों से जानते थे। खुशवंत सिंह एक दौर में हर रोज अपनी पत्नी और अपने या किसी संबंधी के बच्चों के साथ रात के वक्त मार्केट में आइसक्रीम खाने के लिए जाते थे। बेशक उनकी कलम के शैदाइयों से लेकर खान मार्केट के दुकानदारों को उनकी बहुत याद आती है। आएगी भी क्यों नहीं। आखिऱ उनके जैसा लेखक और इंसान सदियों में जन्म जो लेता है।

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